kavita

मेरे भय्या

तेरे साथ जो बीता बचपन कितना सुन्दर जीवन था, ख़ूब लड़ते थे फिर हँसते थे कितना सुन्दर बचपन था, माँ जब तुझको दुलारती मेरा मन भी चिढ़ता था तू है उनके बुढ़ापे की लाठी ये मेरी समझ न आता था, स्कूल से जब तू छुट्टी करता मेरा मन भी मचलता था फिर भी मैं स्कूल को जाती ये मेरा एक मकसद था। बड़े हुए हम और बीता बचपन फिर तुझको बहना की सुध आई हुई जब विदा तेरी बहना तेरी आँखें भर आई, अब याद आता है बीता बचपन कैसे हम हम... »

कितने ही दिन गुज़रे हैं पर, ना गुजरी वो शाम अभी तक; तुम तो चले गए पर मैं हूँ, खुद में ही गुमनाम अभी तक! . तुम्ही आदि हो,…तुम्ही अन्त हो,…तुमसे ही मैं हूँ, जो हूँ; ये छोटी सी बात तुम्हें हूँ, समझाने में नाकाम अभी तक! . कैसे कह दूँ, …तुम ना भटको, …मैं भी तो इक आवारा हूँ; शाम ढले मैं घर न पहुँचा, है मुझपे ये इल्ज़ाम अभी तक! . प्यार से, ‘पागल’ नाम दिया था, तूने जो इक रोज़ मुझे; तु... »

लंबी इमारतों से भी बढकर, कचरे की चोटी हो जाती है

लंबी इमारतों से भी बढकर, कचरे की चोटी हो जाती है

जिंदगी की सुंदर प्लास्टिक, कचरें में बदल जाती है अगर यूज न हो ढंग से, ऐसे ही जल जाती है कभी कभी जिंदगी से बढी मौत हो जाती है जिंदगी कभी कभी पानी में भी जल जाती है| कुछ को तो कचरे फैलाने से फ़ुरसत नहीं कुछ की तो जिंदगी कचरें में गुजर जाती है| फैलती हुई दुनिया में, जिंदगी कहीं सिमटी सी है लंबी इमारतों से भी बढकर, कचरे की चोटी हो जाती है| »

तकदीर का क्या, वो कब किसकी सगी हुई है।

तकदीर का क्या, वो कब किसकी सगी हुई है। दुनिया अपने हौसले से ,जमीं हुई है। खुशफहमी ना पाल कि नसीब से सब मिलेगा। कर्म करने से ही ये आसमाँ झूकेगा। लाख लगाओ फेरे ,मन्दिर, मस्जिद, चर्च ,गुरूद्वारे। कर्म के आगे, इन्साँ इन्हें भी बिसारे। समय के चक्र पर निशाना साध ले प्यारे , काश के फेर में पड,मत हाँफ दुलारे। हाय री किस्मत कह फिर रोएगा ,पछताएगा। एक बार ये समय जो हाथ से निकल जाएगा। जहाँ साहा इतने दिन,कुछ औ... »

आज कुछ लिखने को जी करता है

आज कुछ लिखने को जी करता है आज फिर से जीने को जी करता है दबे है जो अहसास ज़हन में जमाने से उनसे कुछ अल्फ़ाज उखेरने को जी करता है »

“ना पा सका “

“ना पा सका “

ღ_ना ख़ुदी को पा सका, ना ख़ुदा को पा सका; इस तरह से गुम हुआ, मैं मुझे ना पा सका! . जिस मोड़ पे जुदा हुआ, तू हाथ मेरा छोड़ के; मैं वहीँ खड़ा रहा, कि फिर कहीं ना जा सका! . मुझसे इतर भला मेरे, अक्स का वजूद क्या; जो रौशनी ही ना रही, साया भला कहाँ रहा! . साथ है तो अक्स है, जुदा हुआ तो क्या रहा; अरे मैं ही ग़र ना रहा, अक्स फिर कहाँ रहा! . मेरे अक्स, पे ही मेरे, क़त्ल का इल्ज़ाम है; जो आईना गवाह था, वो आईना तो त... »

डरा हुआ हु मैं | Dra Hua Hu Mai |

डरा हुआ हु मैं | Dra Hua Hu Mai |

बैंगलोर मे हुए कावेरी विवाद को देखते हुए अपने कुछ एहसासों को आपके सामने रखने की एक कोशिश की है और शायद आप भी इससे जुड़ पाए | चारो और जलती- दहलती प्रस्थिथियो से भयातुर सा हुआ हु में.. हाँ! डरा हुआ हु मैं ..   लेके नाम रब का और साथ सब का युही अड़ा हुआ हु मैं . हाँ! डरा हुआ हु मैं ..   हादसा पहली बार नहीं, देखता हर बार हु मैं पहली महत्बा अपने पे बीती है शायद इसीलिए भरा हुआ हु मैं हाँ! डरा हु... »

प्यार पनपता है

प्यार पनपता है…. इक नन्हे पौधे की तरह खोलकर महीन मिट्टी की परतों को पाकर चंद बूंदे पानी की खोलकर अपनी हरी बाहें समा लेना चाहता है दुनिया को इनमें मगर कभी कभी रूंध जाता है दुनिया की आपाधापी में किसी के पैरों तले| »

“मैं कौन हूँ”

“मैं कौन हूँ”

ღღ_मैं कौन हूँ आखिर, और कहाँ मेरा ठिकाना है; कहाँ से आ रहा हूँ, और कहाँ मुझको जाना है! . किसी मकड़ी के जाले-सा, उलझा है हर ख़याल; जैसे ख़ुद के ही राज़ को, ख़ुद ही से छुपाना है! . मेरी पहचान के सवालों पर; ख़ामोश हैं सब यूँ; जैसे पोर-पोर दुखता हो, और बोझ भी उठाना है! . वैसे तो इन गलियों से, मैं मिला ही नहीं कभी; पर इस शहर से लगता है, रिश्ता कोई पुराना है! . इक भूला हुआ फ़साना, ज़हन में उभर रहा है; कोई जो मु... »

“महबूब”

“महबूब”

शबनम से भीगे लब हैं, और सुर्खरू से रुख़सार; आवाज़ में खनक और, बदन महका हुआ सा है! . इक झूलती सी लट है, लब चूमने को बेताब; पलकें झुकी हया से, और लहजा ख़फ़ा सा है! . मासूमियत है आँखों में, गहराई भी, तूफ़ान भी; ये भी इक समन्दर है, ज़रा ठहरा हुआ सा है! . बेमिसाल सा हुस्न है, और अदाएँ हैं लाजवाब; जैसे ख़्वाबों में कोई ‘अक्स’, उभरा हुआ सा है! . जाने वालों ज़रा सम्हल के, उनके सामने जाना; मेरे महबूब के चेहरे से, ... »

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