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  • मेरे भय्या

    तेरे साथ जो बीता बचपन
    कितना सुन्दर जीवन था,
    ख़ूब लड़ते थे फिर हँसते थे
    कितना सुन्दर बचपन था,
    माँ जब तुझको दुलारती
    मेरा मन भी चिढ़ता था
    तू है उनके बुढ़ापे की लाठी
    ये मेरी समझ न आता था,
    स्कूल से जब तू छुट्टी करता
    मेरा मन भी मचलता था
    फिर भी मैं स्कूल को जाती
    ये मेरा एक मकसद था।

    बड़े हुए हम और बीता बचपन
    फिर तुझको बहना की सुध आई
    हुई जब विदा तेरी बहना
    तेरी आँखें भर आई,
    अब याद आता है बीता बचपन
    कैसे हम हमझोली थे
    एक दूसरे की शिकायत करते
    फिर भी हम हमझोली थे।
    आ गई राखी भय्या अब तो
    तेरी बहना घर आयेगी
    राखी बाँध तेरे हाथों में
    बचपन की याद दिलाएगी।

    — सीमा राठी

  • Untitled post 16779

    कितने ही दिन गुज़रे हैं पर, ना गुजरी वो शाम अभी तक;
    तुम तो चले गए पर मैं हूँ, खुद में ही गुमनाम अभी तक!
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    तुम्ही आदि हो,…तुम्ही अन्त हो,…तुमसे ही मैं हूँ, जो हूँ;
    ये छोटी सी बात तुम्हें हूँ, समझाने में नाकाम अभी तक!
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    कैसे कह दूँ, …तुम ना भटको, …मैं भी तो इक आवारा हूँ;
    शाम ढले मैं घर न पहुँचा, है मुझपे ये इल्ज़ाम अभी तक!
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    प्यार से, ‘पागल’ नाम दिया था, तूने जो इक रोज़ मुझे;
    तुम तो बेशक़ भूले हो पर, सब लेते हैं वो नाम अभी तक!
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    तूने जो भेजा था ख़त मुझको, मेरे इक ख़त के जवाब में;
    पढ़ा नहीं, पर रक्खा है, ‘अक्स’ मैंने वो पैग़ाम अभी तक!!…#अक्स

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  • लंबी इमारतों से भी बढकर, कचरे की चोटी हो जाती है

    लंबी इमारतों से भी बढकर, कचरे की चोटी हो जाती है

    जिंदगी की सुंदर प्लास्टिक, कचरें में बदल जाती है
    अगर यूज न हो ढंग से, ऐसे ही जल जाती है

    कभी कभी जिंदगी से बढी मौत हो जाती है
    जिंदगी कभी कभी पानी में भी जल जाती है|

    कुछ को तो कचरे फैलाने से फ़ुरसत नहीं
    कुछ की तो जिंदगी कचरें में गुजर जाती है|

    फैलती हुई दुनिया में, जिंदगी कहीं सिमटी सी है
    लंबी इमारतों से भी बढकर, कचरे की चोटी हो जाती है|

  • तकदीर का क्या, वो कब किसकी सगी हुई है।

    तकदीर का क्या, वो कब किसकी सगी हुई है।
    दुनिया अपने हौसले से ,जमीं हुई है।
    खुशफहमी ना पाल कि नसीब से सब मिलेगा।
    कर्म करने से ही ये आसमाँ झूकेगा।
    लाख लगाओ फेरे ,मन्दिर, मस्जिद, चर्च ,गुरूद्वारे।
    कर्म के आगे, इन्साँ इन्हें भी बिसारे।
    समय के चक्र पर निशाना साध ले प्यारे ,
    काश के फेर में पड,मत हाँफ दुलारे।
    हाय री किस्मत कह फिर रोएगा ,पछताएगा।
    एक बार ये समय जो हाथ से निकल जाएगा।
    जहाँ साहा इतने दिन,कुछ और धैर्य बना ले।
    नोट बन्दी के हवन में कुछ समिधा चढा ले।
    फिर आएगी नीत नयी भोर मन में बसा ले।
    काले धन वालों से अब पीछा छुडा ले ,
    पर आऐंगे कैसे अच्छे दिन ,ये तो बुझा ले।
    फिर कैसे ना रिश्वत चलेगी?भ्रष्टाचार ना होगा?
    कोई तो सामने आ शपथ दिला दे।
    सावित्री राणा
    काव्य कुँज।

  • आज कुछ लिखने को जी करता है

    आज कुछ लिखने को जी करता है
    आज फिर से जीने को जी करता है
    दबे है जो अहसास ज़हन में जमाने से
    उनसे कुछ अल्फ़ाज उखेरने को जी करता है

  • “ना पा सका “

    “ना पा सका “

    ღ_ना ख़ुदी को पा सका, ना ख़ुदा को पा सका;
    इस तरह से गुम हुआ, मैं मुझे ना पा सका!
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    जिस मोड़ पे जुदा हुआ, तू हाथ मेरा छोड़ के;
    मैं वहीँ खड़ा रहा, कि फिर कहीं ना जा सका!
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    मुझसे इतर भला मेरे, अक्स का वजूद क्या;
    जो रौशनी ही ना रही, साया भला कहाँ रहा!
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    साथ है तो अक्स है, जुदा हुआ तो क्या रहा;
    अरे मैं ही ग़र ना रहा, अक्स फिर कहाँ रहा!
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    मेरे अक्स, पे ही मेरे, क़त्ल का इल्ज़ाम है;
    जो आईना गवाह था, वो आईना तो तू रहा!
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    अब ऐ मेरे हमनवा, ये फ़ैसला तुझ पर रहा;
    कि दोनों ही का साथ दो, या कहो अलविदा!!…#अक्स
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  • डरा हुआ हु मैं | Dra Hua Hu Mai |

    डरा हुआ हु मैं | Dra Hua Hu Mai |

    बैंगलोर मे हुए कावेरी विवाद को देखते हुए अपने कुछ एहसासों को आपके सामने रखने की एक कोशिश की है और शायद आप भी इससे जुड़ पाए |

    चारो और जलती- दहलती प्रस्थिथियो से

    भयातुर सा हुआ हु में..

    हाँ! डरा हुआ हु मैं ..

     

    लेके नाम रब का और साथ सब का

    युही अड़ा हुआ हु मैं .

    हाँ! डरा हुआ हु मैं ..

     

    हादसा पहली बार नहीं, देखता हर बार हु मैं

    पहली महत्बा अपने पे बीती है शायद

    इसीलिए भरा हुआ हु मैं

    हाँ! डरा हुआ हु मैं ..

     

    माथे पे जो शिकन है उसे छुपाये

    देखने को वो हर दाव उसका

    आँखों से आँखे मिलाये यही खड़ा हुआ हु मैं

    हाँ! डरा हुआ हु मैं ..

     

    माहौल मैं ऐसे , उस माँ का अपने बच्चे को सीने से लगाने

    के सुख को देख तरा हुआ हु मैं

    हाँ! डरा हुआ हु मैं ..

     

    देख के रोष इन मदहोश प्रदर्शनकारियों का

    उनकी आँखों मैं जलती चिंगारियों का

    उनकी आवाज़ों से झलकती नाशादीओ का

    आज एक मोहरा बना हुआ हु मैं .

    और वही खुद के कहे अनकहे विचारो के

    इरतेआशो से घिरा हुआ हु मैं .

    हाँ! डरा हुआ हु मैं ..!!

    हाँ! डरा हुआ हु मैं ..!!

  • प्यार पनपता है

    प्यार पनपता है….
    इक नन्हे पौधे की तरह
    खोलकर महीन मिट्टी की परतों को
    पाकर चंद बूंदे पानी की
    खोलकर अपनी हरी बाहें
    समा लेना चाहता है दुनिया को इनमें
    मगर कभी कभी रूंध जाता है
    दुनिया की आपाधापी में
    किसी के पैरों तले|

  • “मैं कौन हूँ”

    “मैं कौन हूँ”

    ღღ_मैं कौन हूँ आखिर, और कहाँ मेरा ठिकाना है;
    कहाँ से आ रहा हूँ, और कहाँ मुझको जाना है!
    .
    किसी मकड़ी के जाले-सा, उलझा है हर ख़याल;
    जैसे ख़ुद के ही राज़ को, ख़ुद ही से छुपाना है!
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    मेरी पहचान के सवालों पर; ख़ामोश हैं सब यूँ;
    जैसे पोर-पोर दुखता हो, और बोझ भी उठाना है!
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    वैसे तो इन गलियों से, मैं मिला ही नहीं कभी;
    पर इस शहर से लगता है, रिश्ता कोई पुराना है!
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    इक भूला हुआ फ़साना, ज़हन में उभर रहा है;
    कोई जो मुझको पूछे, कहना कि ये दिवाना है!
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    कोई शख्श हो शायद, मेरी पहचान का शहर में;
    कि तलाश-ए-इश्क़ में हमने, छोड़ा आशियाना है!!…#अक्स

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  • “महबूब”

    “महबूब”

    शबनम से भीगे लब हैं, और सुर्खरू से रुख़सार;

    आवाज़ में खनक और, बदन महका हुआ सा है!

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    इक झूलती सी लट है, लब चूमने को बेताब;

    पलकें झुकी हया से, और लहजा ख़फ़ा सा है!

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    मासूमियत है आँखों में, गहराई भी, तूफ़ान भी;

    ये भी इक समन्दर है, ज़रा ठहरा हुआ सा है!

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    बेमिसाल सा हुस्न है, और अदाएँ हैं लाजवाब;

    जैसे ख़्वाबों में कोई ‘अक्स’, उभरा हुआ सा है!

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    जाने वालों ज़रा सम्हल के, उनके सामने जाना;

    मेरे महबूब के चेहरे से, नक़ाब सरका हुआ सा है!!

    ღღ__अक्स__ღღ

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  • “मुलाकात रहने दो”

    “मुलाकात रहने दो”

    ღღ_आज ना ही आओ मिलने, ये मुलाकात रहने दो;
    कुछ देर को मुझको, आज मेरे ही साथ रहने दो!
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    अन्धेरों की, उजालों की, हवाओं की, चिरागों की;
    या अपनी ही कोई बात छेड़ो, मेरी बात रहने दो!
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    मैं सोया कि नहीं सोया, मैं रोया कि नहीं रोया;
    और भी काम हैं तुमको, ये तहकीकात रहने दो!
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    यूँ तो सैकड़ों रात जागा हूँ, तुम्हारे ही ख्यालों में;
    पर सोना चाहता हूँ अब, आज की रात रहने दो!
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    जाते-जाते ‘अक्स’, मेरा इक मशविरा है तुमको;
    कि इश्क़ करो तो बे-हद, यूँ एहतियात रहने दो!!…#अक्स
    .

  • घूस

    घूस

    लिखते तो हम बहुत थे
    मगर आज कलम चिगती ही नहीं
    बोलती है जरा सी घूस तो दो
    तो दो लफ़्ज लिख दूंगी|

  • उनके मुस्कुराने से आ गयी मुस्कान

    उनके मुस्कुराने से आ गयी मुस्कान हमारे चेहरे पर
    वरना किसी गम में डूबी जा रही थी जिंदगी मेरी

  • मुन्तजिर हूं मैं मोहब्बत का

    मुन्तजिर हूं मैं मोहब्बत का
    मयखानों की मुझे तलाश नहीं
    इक दरिया है जिसे मैं ढ़ूढ़ता हूं
    पैमानों के जामों की मुझे प्यास नहीं

  • जब जिंदगी खाली खाली सी है

    कैसे लिखें इस कागज पर
    जब जिंदगी खाली खाली सी है
    स्याही है ही नहीं
    शब्दों को उतारने के लिए

  • वक्त

    कहां थे फ़ासले तेरे मेरे दरम्या
    इक वक्त था जो जम गया था हमारे बीच

  • “देखा नहीं तुमने”

    “देखा नहीं तुमने”

    ღღ_ख़ुद से लेते हुए इन्तक़ाम, देखा नहीं तुमने;
    अच्छा हुआ मेरा अस्क़ाम, देखा नहीं तुमने!
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    उतर ही जाता चेहरा मेरा, शर्म से उसी दम;
    अच्छा हुआ मेरा अन्जाम, देखा नहीं तुमने!
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    कल रात को हर ख़्वाब से, लड़ गया था मैं;
    अच्छा हुआ मेरा इत्माम, देखा नहीं तुमने!
    .
    रोया था मैं ही चीखकर, ख़्वाबों की मौत पे;
    अच्छा हुआ ये ग़म तमाम, देखा नहीं तुमने!
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    सुबह तक पड़े रहे, टुकड़े ख्वाबों की लाश के;
    अच्छा हुआ मुझे नाकाम, देखा नहीं तुमने!
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    मैंने ही ‘अक्स’ आग दी, मैं ही था शमशान में;
    अच्छा हुआ सोज़—ए-निहाँ, देखा नहीं तुमने!!…..#अक्स
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    शब्द…………………..अर्थ
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    अस्क़ाम = बुराईयाँ, कमियां
    इत्माम = प्रवीणता, सिद्धि
    सोज़-ए-निहाँ = जलने के निशान

  • “ग़ज़ल होती है”

    “ग़ज़ल होती है”

    ღღ_महबूब से मिलने की, हर तारीख़ ग़ज़ल होती है;
    महफ़िल में उनके हुस्न की, तारीफ़ ग़ज़ल होती है!
    .
    ग़ज़ल होती है महबूब की, बोली हुई हर बात;
    आशिक के हर ख्वाब की, तकदीर ग़ज़ल होती है!
    .
    गर आज़माओ तो ज़ंजीर से, मज़बूत है ग़ज़ल;
    तोड़ना हो तो विश्वास से, बारीक़ ग़ज़ल होती है!
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    आशिक़ के दिल की आह भी, होती है इक ग़ज़ल;
    कहते हैं कि मोहब्बत की, तासीर ग़ज़ल होती है!
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    ‘अक्स’, कलमकार की कलम का, तावीज़ है ग़ज़ल;
    अग़र नाम हो जाये, तो हर नाचीज़ ग़ज़ल होती है!!….#अक्स

  • “ग़ज़ल लिक्खूँगा!”

    “ग़ज़ल लिक्खूँगा!”

    ღღ_मैं भी लिक्खूँगा किसी रोज़, दास्तान अपनी;
    मैं भी किसी रोज़, तुझपे इक ग़ज़ल लिक्खूँगा!
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    लिक्खूँगा कोई शख्स, तो परियों-सा लिक्खूँगा;
    ग़र गुलों का ज़िक्र आया तो, कमल लिक्खूँगा!
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    बात ग़र इश्क़ की होगी, तो बे-इन्तहा है तू;
    ज़िक्र ग़र तारीख का होगा, तो अज़ल लिक्खूँगा!
    .
    मैं लिक्खूँगा तेरी रातों की, मासूम-सी नींद;
    और अपनी बेचैन करवटों की, नक़ल लिक्खूँगा!
    .
    हाँ ज़रा मुश्किल है, तुझे लफ़्ज़ों में बयां करना;
    फिर भी यकीन मानो साहब, मुकम्मल लिक्खूँगा!
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    ये जानता हूँ “अक्स”, कि तुझे झूठ से नफरत है;
    इसलिए जो भी लिक्खूँगा, सब असल लिक्खूँगा!!….#अक्स

  • “जाने दे!”

    “जाने दे!”

    ღღ__महज़ एक लम्हा ही तो हूँ, गुज़र जाने दे;
    इस तरह तू जिंदगी अपनी, संवर जाने दे!
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    ले चलें जिस डगर, दुश्वारियाँ मोहब्बत की;
    मेरे महबूब अब मुझको, बस उधर जाने दे!
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    तुझे ठहरना है जिस ठौर, तू ठहर, जाने दे;
    मुझे क़ुबूल है इश्क़ का, हर कहर, जाने दे!
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    तू बोलता रहा, और मैं सुनता रहा, खामोश;
    मुझे भी कहना है बहुत कुछ, मगर जाने दे!
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    इससे पहले “अक्स”, तू अपना रास्ता बदले;
    मैं ही मुड़ जाता हूँ, मेरे हमसफ़र, जाने दे!!….#अक्स
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  • मगर कब तक!

    मगर कब तक!

    ღღ_कर तो लूँ मैं इन्तजार, मगर कब तक;
    लौट आएगा बार-बार, मगर कब तक!
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    उसे चाहने वालों की, कमी नहीं है दुनिया में;
    याद आएगा मेरा प्यार, मगर कब तक!
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    प्यार वो जिस्म से करता है, रूह से नहीं;
    बिछड़कर रहेगा बे-क़रार, मगर कब तक!
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    दर्द अहसास ही तो है, मर भी सकता है;
    बहेंगे आँखों से आबशार, मगर कब तक!
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    कहीं फिर से मोहब्बत, कर ना बैठे ‘अक्स’;
    दिल पे रखता हूँ इख्तियार, मगर कब तक!!…..#अक्स
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  • Marathi Prem Kavita

    माझ्याशी आजकाल हे घडते विचित्र आहे
    माझ्याशी आजकाल हे घडते विचित्र आहे ,
    डोळ्यापुढे माझ्या गा तुझेच चित्र आहे
    तुझे रूपवर्णन करण्यापलीकडे शब्दही अपुरे ,
    हातात माझ्या अझुनी ते अपूर्ण पत्र आहे
    एका कटाक्षाने घालीले भुरड असे हृदयाला
    हा तळमळतो तुझ्यासाठी,धीर देतो मी पात्र आहे
    ओढणीच्या ढगाला सरसावून बघणं झरा चंद्रमुखी ,
    विखुरलेल्या वस्तीत ग काळोख सर्वत्र आहे
    प्रत्येक दिवस मोहरतो मिळण्याच्या तृप्त आशेने ,
    स्वनांच्या गंधात बहरलेली प्रत्येक रात्र आहे
    आज कळलय मला गगन रूप खरे प्रेमाचे
    ना वैरी कुणी प्रेमासारखा ना कुणी मित्र आहे ।

  • “अलग है”

    ღღ_यूँ हर एक शख्स में अब, मत ढूँढ तू मुझको;
    मैं “अक्स” हूँ ‘साहब’, मेरा किरदार ही अलग है!
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    झूठ के सिक्कों से, हर चीज़ मिल ही जाती है;
    पर जहाँ मैं भी बिक जाऊं, वो बाज़ार ही अलग है!
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    यूँ तो हुस्न वाले, कम नहीं हैं इस दुनिया में;
    पर जिसपे मैं फ़ना हूँ, वो हुस्न-ए-यार ही अलग है!
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    यूँ तो इन्तज़ार करना, मेरी फितरत में नहीं शामिल;
    पर तेरी बात कुछ और है, तेरा इन्तज़ार ही अलग है!
    .
    राँझा, फ़रहाद, मजनू अब, गुज़रा हुआ कल हैं;
    मैं ख़ुद ही ख़ुद की मिसाल हूँ, मेरा प्यार ही अलग है!!….

    #अक्स

  • ღღ_कभी यूँ भी तो हो

    ღღ_कभी यूँ भी तो हो, कि दिल की अमीरी बनी रहे;
    फिर चाहे तो ज़िन्दगानी, ग़ुरबत में बसर कर दे!
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    कोई एक शाम फुरसत की, कभी मेरे लिए निकाल;
    फिर उस मुलाकात में ही, तू शाम से सहर कर दे!
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    तेरे होठों की मिठास तो, मुझे चख लेने दे एक बार;
    फिर बाकी की उम्र सारी, गर चाहे तो ज़हर कर दे!
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    दिन-रात माँगता हूँ, रब से बस तुझको दुआ में मैं;
    ऐ-काश कि वो तुझको ही, मेरा हमसफ़र कर दे!
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    सूना लगता है जहाँ सारा, तुझ बिन ऐ-साहिबा;
    कभी यूँ भी तो हो, कि तू मेरे ख्वाबों में रंग भर दे!!….‪#‎अक्स‬
    .

  • “देर तलक”

    ღღ_कल फ़िर से दोस्तों ने, तेरा ज़िक्र किया महफ़िल में;
    कल फ़िर से अकेले में, तुझे सोंचता रहा मैं देर तलक!
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    कल फ़िर से तेरी यादों ने, ख़्वाबों की जगह ले ली;
    कल फ़िर से मेरे यार, तुझे देखता रहा मैं देर तलक!
    .
    कल फ़िर से तेरी गली में, भटकने की आरज़ू हुई;
    कल फिर से एक बार, ख़ुद को रोकता रहा मैं!
    .
    कल फिर से तेरा एहसास, मुझे छूकर गुज़र गया;
    कल फिर से तेरी तलाश में, यूँ ही भागता रहा मैं!
    .
    कल फिर से मैंने नींद से, वादा कियां था सोने का;
    कल फिर नींद में “अक्स”, जागता रहा मैं देर तलक!!…..‪

    #‎अक्स‬

  • “ख़ुदा-ख़ुदा करके”

    ღღ_तजुर्बे सब हुए मुझको, महज़ उससे वफ़ा करके;
    दुआ जीने की दी उसने, मुझे खुद से जुदा करके!
    .
    मैं कहना चाहता तो हूँ, यकीं उसको अगर हो तो;
    ग़ैर का हो नहीं सकता, उससे अहद-ए-वफ़ा करके!
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    मैं मुजरिम हूँ अगर तेरा, सजा जो चाहता हो दे;
    न ख़ुद से दूर रख तू यूँ, मर जाऊंगा ज़रा-ज़रा करके!
    .
    शिकायत है अगर मुझसे, तो बताते क्यूँ नहीं आख़िर;
    सुकून थोडा तो मिल जाता, हाल-ए-दिल बयां करके!
    .
    नज़र किसकी लगी है “अक्स”, ख़ुदाया प्यार को अपने;
    कौन है अपना, जो मुझको लूटता है ख़ुदा-ख़ुदा करके!!…..‪#‎अक्स‬
    .

  • “नहीं होता”

    ღღ_वो चाँद जो दिखता है, वो सबको ही दिखता है;
    महज़ देख लेने भर से ही, वो हमारा नहीं होता!
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    दिन तो कट ही जाता है, कश्मकश में जिंदगी की;
    तेरे बिन एक पल भी, रातों में गुज़ारा नहीं होता!!
    .
    कैसे कह दूँ कि मुझे तुमसे, मोहब्बत ही नहीं है;
    आख़िर मैं यूँ ही तो बे-वजह, आवारा नहीं होता!!
    .
    एक रिश्ता है कई जन्मों से, दरमियान अपने शायद;
    वरना ज़रा-सी बात में तुम मेरी, मैं तुम्हारा नहीं होता!!
    .
    मैं एक शायर हूँ “अक्स”, और वो मेरी ही गज़ल है;
    ना इश्क़ होता और ना मैं, गर तेरा इशारा नहीं होता!!….‪#‎अक्स‬
    .

  • “कहाँ रहते हो”

    “कहाँ रहते हो”

    ღღ_हम ढूँढ आए ये शहर-ए-तमाम, कहाँ रहते हो;
    अरे अब आ जाओ कि हुई शाम, कहाँ रहते हो!
    .
    इज्जत ख़ुद नहीं कमाई, विरासत ही सम्हाल लो;
    कहीं हो जाए ना ये भी नीलाम, कहाँ रहते हो!
    .
    रस्मो-रिवाज़ इस दुनिया के, तुझे जीने नहीं देंगे;
    जब तक मिल जाए ना इक मुकाम, कहाँ रहते हो!
    .
    तेरे दिल से जो कोई खेलेगा, तो समझ जाओगे;
    किसे कहते हैं सुकून-ओ-आराम, कहाँ रहते हो!
    .
    अब तुम्ही बताओ “अक्स”, और कैसे तुझे पाऊँ;
    कि रब से माँगा है सुबह-ओ-शाम, कहाँ रहते हो!!….‪#‎अक्स‬
    .

     

  • “नहीं देखा”

    ღღ_मोहब्बत करके नहीं देखी, तो ये जहाँ नहीं देखा;
    मेरे महबूब तूने शायद, पूरा आसमां नहीं देखा!
    .
    तुझमें खोया जो एक बार, फ़िर मिला नहीं कभी;
    खुद की ही तलाश में मैंने, कहाँ-कहाँ नहीं देखा!
    .
    मंज़िल की क्या ख़ता जो, भटकता रहा मैं ही;
    की जिधर रास्ता सही था, मैंने वहाँ नहीं देखा!
    .
    मेरे शहर के सब लोग, अमनपसंद हो गये शायद;
    एक अरसे से किसी घर से, उठता धुआँ नहीं देखा!
    .
    नासमझ हो तुम “अक्स”, जो मासूम समझते हो;
    उनका हुस्न तो देखा तुमने, उनका गुमाँ नहीं देखा!!….‪#‎अक्स‬
    .

     

  • “बुरा लगता है”

    ღღ__तेरे लब पे सिवा मेरे, कोई नाम आये तो बुरा लगता है;
    इक वही मौसम, जब हर शाम, आये तो बुरा लगता है!
    .
    जागते रहने की तो हमको, आदत हो गयी मोहब्बत में;
    नींद अब किसी रोज़, सरे-शाम आये तो बुरा लगता है!
    .
    गर इन तन्हाईयों में गुमनाम ही, मर जाऊं तो बेहतर है;
    अब किसी महफ़िल में, मेरा नाम आये तो बुरा लगता है!
    .
    ज़र्द पड़ चुके हैं सारे, वो टूटते पत्ते, बेजुबाँ मोहब्बत के;
    अब इश्क़ के नाम से, कोई पयाम आये तो बुरा लगता है!
    .
    ज़िन्दा हैं जब तक “अक्स”, उन लबों के बे-हिसाब पैमाने;
    मेरे इन होठों पे कोई और, जाम आये तो बुरा लगता है!!…
    .‪
    #‎अक्स‬

  • “कोई राब्ता तो हो!!.”

    ღღ__ठहरा हुआ हूँ कब से, मैं तेरे इन्तज़ार में;
    आख़िर सफ़र की मेरे, कोई इब्तिदा तो हो!
    .
    मंजिल पे मेरी नज़र है, अरसे से टिकी हुई;
    पहुँचूं मैं कैसे उस तक, कोई रास्ता तो हो!
    .
    किस तरह छुपाऊँ, जो ज़ाहिर हो चुका उसपे;
    मैं कहना चाहता भी हूँ, पर कोई वास्ता तो हो!
    .
    वो कहता है ढूँढ लेंगे; तुझे दुनिया की भीड़ से;
    मगर उससे पहले मेरे यार, तू लापता तो हो!!
    .
    फिक्र तो बहुत होती है, “अक्स” उसको तेरी;
    हाल पूछे भी तो भला कैसे, कोई राब्ता तो हो!!….‪#‎अक्स‬

  • “डर लगता है!!”

    “डर लगता है!!”

    ღღ__जब दर्द भी दर्द ना दे पाए, तो डर लगता है;
    आशिक़ी हद से गुज़र जाये, तो डर लगता है!!
    .
    डर लगता है अक्सर, किसी के पास आने से;
    पास आके वो गुज़र जाये, तो डर लगता है!!
    .
    कुछ ख्वाहिशें बेशक़, मर जाएँ तो ही बेहतर है;
    कुछ ज़रूरतें यूँ ही, मर जाएँ तो डर लगता है!!
    .
    इक बार कहा था उसने, आशिक़ी बे-मतलब है;
    ये मतलब गर समझ आ जाये, तो डर लगता है!!
    .
    कोई ऐसा भी घाव होगा, जिससे मरने में हो मज़ा;
    जो वही घाव भर जाए ‘अक्स’, तो डर लगता है!!…..‪#‎अक्स‬

    .

     

  • लिखते लिखते आज

    लिखते लिखते आज कलम रूक गयी
    इक ख्याल अटक सा गया था
    दिल की दरारों में कहीं|

  • लफ़्जों को तो हम ढूढ कर ले आये हम

    लफ़्जों को तो हम ढूढ कर ले आये हम
    अब पराये जज्बातों को कैसे बुलाये हम

  • हाँ मैं कश्मीर हूँ

    क्या यही सरजमीं थी मेरे वास्ते
    ये कैसी कमी थी मेरे वास्ते
    खुद को देखू तो स्वर्ग का अहसास हैं
    मेरे दामन में आतंक का आभास हैं
    सहमे सहमे है बच्चे मेरे हर घरी
    जाने कब टूटेगी ये नफरत की लड़ी
    साडी दुनिया के नज़रो में मैं हीर हूँ
    बहुत बेबस और खामोश मैं कश्मीर हूँ
    नहि हिन्दू हूँ और न मैं मुस्लमान हूँ
    सिर्फ जंग और लाशो का साक्षिमान हूँ
    यूँ न बारूद से मुझ को जीतोगे तुम
    पैगाम अमन का देने को आतुर मैं हूँ
    कभी भारत तो कभी पाकिस्तान और चीन
    लूट लो सब मुझे मैं हूँ बहुत कमसिन
    मेरे आँगन से तिरंगे तक को छीन लिया
    मेरे जख्मो से इंसानियत तलक हैं गमगीन
    जिसका जितना भी हिस्सा है मुझ में जान लो
    चाहो तो मुझ से मेरी रूह तलक बाँट लो
    इतना ही बस मुझ पर कर दो एहसान
    मेरी सरजमीं को मत बनाओ शमसान
    अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वाला मैं एक वीर हूँ
    बहुत बेबस और खामोश मैं कश्मीर हूँ
    हाँ मैं कश्मीर हूँ !!!!!!

  • आस उनके आने की

    आस उनके आने की कभी खत्म नहीं होती
    जिद उनके आने की कभी खत्म नहीं होती

  • सावन की बूंदों से

    रिमझिम रिमझिम वर्षा से,
    जब तन मन भीगा जाता है,
    राग अलग सा आता है मन में,
    और गीत नया बन जाता है I 

    कोशिश करता है कोई शब्दों कि,
    कोई मन ही मन गुनगुनाता है,
    कोई लिए कलम और लिख डाले सब कुछ,
    कोई भूल सा जाता है I 

    सावन का मन भावन मौसम,
    हर तन भीगा जाता है,
    झींगुर, मेढक करते शोरगुल,
    जो सावन गीत कहलाता है I 

    हरियाली से मन खुश होता,
    तन को मिलती शीत बयार,
    ख़ुशी ऐसी मिलती सब को,
    जैसे मिल गया हो बिछड़ा यार I 

    गाड़ गधेरे, नौले धारे सब,
    पानी से भर जाते है,
    नदिया करती कल कल,
    और पंछी सुर में गाते है I 

    “सावन की  बूदों” का रस,
    तन पर जब पड जाता है,
    रोम रोम खिल जाता है सबका,
    स्वर्ग यही मिल जाता है I

  • मैनें आखिर वो बात कह ही दी

    डरते डरते ही सही मैनें आखिर वो बात कह ही दी
    जो लफ़्जों में कभी ढल ना सके वो अहसास आज बयां हो ही गये
    मगर दिल अभी भी गमगीन सा बैठा हुआ है
    जो मैनें कहा है, वो उसने समझा भी है या नहीं||

  • दास्ता ए इशक

    लिखते लिखते स्याही खत्म हो गयी
    दास्ता ए इशक हमसे लिखी न गयी|

  • डर

    इक अजीब सा डर रहता है आजकल
    पता नहीं क्यों, किस वजह से,
    किसी के पास न होने का डर
    या किसी के करीब आ जाने का|

  • दर्द से भी इश्क हो गया है हमें

    क्यों नहीं जुदा होता दर्द हमसे अब
    लगता है दर्द से भी इश्क हो गया है हमें|

  • गर फासले बढते है तो बढ जा

    गर फासले बढते है तो बढ जायें
    यूं करीब रहकर भी हम करीब थे कभी??

  • mera mehboob mera sanam hai…

    SHRINGAAR KI EK RACHNAA
    ———————————————————-
    mera mehboob mera sanam hai…I
    —————————————————–
    saawan ka baadal——
    hai unke aankho ka kaajal
    mayur sa mnn hai nritymay
    bhaavnaao ki baarish hui hai,
    muhabbat ki guzarish hui hai
    is dharkan ko milaa jo mausam hai—-
    wo–mera mehboob–mera sanam hai

    chehre ki laali–surat bholi-bhaali
    muhabbat ki libaas–hayaa kaa shringaar hai
    ehsaas,aitbaar aur pyaar ki triveni—
    ka, jivan mei jo sangam hai—-
    wo– mera mehboob–mera sanam hai

    tanhaai bhi jhoom uthi hai,
    shahnaayee ne umang jagaayee hai
    sooni-sooni thi khushiya bechaari
    mehandi nei use sajaayee hai
    muskuraahato se sugandhitt jo vaataavaran hai—
    wo–mera mehboob–mera sanam hai

    hasee mei chhupi hai-Radhaa ki sharaaratei
    baato mei jaise—vanshi ki taan
    saath jinke–jivan kaa pal-pal
    ho gyaa hai khushiyo kaa vardaan
    is dil mei kashish ka Jo samaagam hai
    wo–mera mehboob–mera sanam hai

    raahe mushqil , prr aasaan lagtee hai
    khushiyaa harpall mehmaan lagtee hai
    sawar gayaa hai zindagi kaa har lamhaa
    hasi,khilkhilaahate meharbaan lagtee hai
    khudaa ka mujhpar–jo hasin karam hai
    wo–mera mehboob–mera sanam hai ……….I

    —————-Ranjit Tiwari “Munna”

  • ” भूख ” (Poetry on Picture Contest)….

    गरीबी ख़ुद के सिवा, औरों पे असरदार नहीं होती;

    शायद इसीलिए भूखों की, कोई सरकार नहीं होती !!

    .

    महज़ दो वक़्त की रोटी, और चन्द पैरहन तन पे;

    फक़ीरों को इससे ज्यादा की, दरकार नहीं होती !!

    .

    रोटियां फेंकने से बेहतर है, किसी गरीब को दे-दो;

    किसी के खा लेने से, रोटी कभी बेकार नहीं होती !!

    .

    भूख का दर्द “साहब”, हर एक दर्द से बढ़कर है;

    गर ये दर्द ना हो तो, शायद कोई तकरार ना होती !!…..#अक्स

     

  • चाहतों की दुनिया से अब उकता गये है

    चाहतों की दुनिया से अब उकता गये है
    सब दिखता है यहां, मगर कुछ मिलता नहीं

  • वो कोई नादान थोड़े है! Entry for “Poetry on Picture Contest”

    वो कोई नादान थोड़े है! Entry for “Poetry on Picture Contest”

    Entry for “Poetry on Picture Contest”

    ღღ_हर लम्हा, हर लफ्ज़, बस एक ही आरजू;
    अरे, दुनिया में बस वही, एक इंसान थोड़े है!
    .
    याद करते रहते हो, रात-रात भर उसको;
    अरे, सुबह को उसके बारे में, इम्तिहान थोड़े है!
    .
    गर दूर जा रहा है वो, तो जाने भी दो साहब;
    अरे, एक शख्स ही तो है, पूरा जहान थोड़े है!
    .
    जो भी किया है उसने, जानबूझकर किया है;
    आखिर दर्द से तेरे, वो कहीं अंजान थोड़े है!
    .
    दर्द देता है वो बेशक, पर मज़ा भी तो देता है;
    अरे मासूम है वो साहब, कोई बे-ईमान थोड़े है!
    .
    कब्ज़ा किये बैठा है, और किराया भी नहीं देता,
    अरे, मेरा दिल है साहब, उसका मकान थोड़े है!
    .
    क्या ताकते रहते हो, यूँ आसमान में साहब;
    अरे, बैठा हुआ ऊपर, कोई भगवान थोड़े है !
    .
    मोहब्बत में तो ये सब, होता ही रहता है “अक्स”;
    अरे, शिक़ायतों से क्या होगा, वो कोई नादान थोड़े है!……‪#‎अक्स‬

  • जो आज है वो कल न होगा

    जो आज है वो कल न होगा!
    गमों का पल हरपल न होगा!
    मिलेगी रोशनी कदमों को,
    दर्द का कोई सकल न होगा!

     


     

    तुम्हारे लब पर नाम मेरा जब आएगा!
    गुजरा हुआ मंजर तुमको नज़र आएगा!
    #बिखरे हुए अफसाने घेरेंगे इसतरह,
    दर्द का समन्दर पलकों में उतर आएगा!

    Written By #महादेव

  • “वो कोई नादान थोड़े है!”……….

    ღღ_हर लम्हा, हर लफ्ज़, बस एक ही आरजू;
    अरे, दुनिया में बस वही, एक इंसान थोड़े है!
    .
    याद करते रहते हो, रात-रात भर उसको;
    अरे, सुबह को उसके बारे में, इम्तिहान थोड़े है!
    .
    गर दूर जा रहा है वो, तो जाने भी दो साहब;
    अरे, एक शख्स ही तो है, पूरा जहान थोड़े है!
    .
    जो भी किया है उसने, जानबूझकर किया है;
    आखिर दर्द से तेरे, वो कहीं अंजान थोड़े है!
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    दर्द देता है वो बेशक, पर मज़ा भी तो देता है;
    अरे मासूम है वो साहब, कोई बे-ईमान थोड़े है!
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    कब्ज़ा किये बैठा है, और किराया भी नहीं देता,
    अरे, मेरा दिल है साहब, उसका मकान थोड़े है!
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    क्या ताकते रहते हो, यूँ आसमान में साहब;
    अरे, बैठा हुआ ऊपर, कोई भगवान थोड़े है !
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    मोहब्बत में तो ये सब, होता ही रहता है “अक्स”;
    अरे, शिक़ायतों से क्या होगा, वो कोई नादान थोड़े है!……‪#‎अक्स‬

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