मैं जितना सुलझता गया

मैं जितना सुलझता गया वो उतनी उलझती गई,
मेरे दिल में उतरती गई आँखों से छलकती गई,

डोर इतनी मजबूत बंधी उसकी जुल्फों से जानो,
के “राही” की राहें जैसे खुद ब खुद सँवरती गई।।

राही अंजाना

Comments

3 responses to “मैं जितना सुलझता गया”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

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