“मैं ढूंढता रहा”

“मैं ढूंढता रहा”
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मैं ढूंढता रहा,
उस शून्य को,
जो मिलकर असंख्य गणना बनते ।
मैं ढूंढता रहा ,
उस गाथा को ,
जिस की अमर प्रेम हर दिशाओं में गूंजते ।
और मैं ढूंढता रहा ,
उस मेघ चंचल मन को
जो अमृत बन वर्षा है करते ।
मैं ढूंढता रहा ,
उस पवन को
जो कलियों की महक ले उन्मुक्त बिचरते ।
मैं ढूंढता रहा ,
उस बावरी चंचल मन को ,
जो मन में बसा प्रीत है करते ।
अंततः
मैं ढूंढता रहा स्वयं को,
जो स्वयं से हर वक्त दूर है रहते।
मिला न,
अब तलक कोई,
जो मेरे सवालों को समझते ?
मैं ढूंढता रहा।
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स्वरचित,मौलिक
योगेन्द्र कुमार निषाद
घरघोड़ा (छ ग) 496111
7000571125

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