“यही मैं सोच-सोचकर हैरान!!!! “….

ऐक हजारों धरती माता, ऐक ही आसमान,
मजहब के झगड़ों में क्यूँ उलझ रहा इंसान,
यही मैं सोच -सोचकर हैरान,
यही मेै सोच-सोचकर हैरान,
भारी -भारी पत्थर लेकर मंदिर रोज बनाते हैं,
उस पत्थर में चूना मिलाकर, मस्जिद रोज चुनाते है,
इन दोनों में प्रेम से रहते, अल्लाह और भगवान,
अरे अल्लाह और भगवान,
यही मैं सोच-सोचकर हैरान,
यही मैं सोच-सोचकर हैरान,
मंदिर -मस्जिद तोड़ने वाले हाथ तेरे क्या आयेगा,
देश को आग लगाने वाले, तु भी तो जल
जायेगा,
मासूमों का खून बहाकर क्यूँ बनता हैवान,
क्यूँ बनता हैवान,
यही मैं सोच-सोचकर हैरान,
यही मैं सोच-सोचकर हैरान,
धर्म बड़ा है मानवता, उसको ही अपनाओ तुम,
कर्म करो इंसान बनो,और सबको गले लगाओ तुम,
आज से प्रतिज्ञा कर लो, बनना है इंसान,
अरे बनना है इंसान,
यही मैं सोच-सोचकर हैरान,
यही मैं सोच-सोचकर हैरान
यही मैं सोच-सोचकर हैरान…

:—-कपिल पालिया “sufi kapil “

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