सिसकता बचपन..

तन्हा चल रहा था सड़क पर मैं,

तब देख रहा था मुझकों, “बाशिंदा उसका” ,

बड़ा मासूम सा वो,तबस्सुम कहीं खोई हुई,

निगाहे तलबगार, और चेहरा उदास था उसका,

जिस हाथ में “होनी थी कलम”, उसमे था?

एक छोटा, टूटा सा कटोरा उसका,

कहते है जिसे, नबाबों की उम्र,

गरीबी की आग मै झुलसता, “ये बचपन था उसका”,

हमउम्र यारों को मौज उड़ाते देख, “जी ललचा”,

पर हर शौक का क़त्ल करता, “बेरहम मुक़द्दर था उसका”,

उम्मीद भरी निगाहों से आया वो मेरे करीब,

और मेरी चंद दौलत को पाकर,

 “लाखो दुआए देता सच्चा दिल था उसका”,

©अंकित आर नेमा.

Comments

5 responses to “सिसकता बचपन..”

  1. Anjali Gupta Avatar
    Anjali Gupta

    I must say…beautiful poetry..touched my heart..thanks for sharing 🙂

  2. Panna Avatar
    Panna

    मर्मस्पर्शी रचना

  3. Anirudh sethi Avatar
    Anirudh sethi

    poem with emotional touch..nice poem

  4. anupriya Avatar
    anupriya

    behad hi khoobsurat poem

  5. Satish Pandey

    Very good poem

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