इश्क से राबता भी नहीं
फासला भी नहीं कर सके।
कुछ संवारा भी ना जा सका,
दुर्दशा भी नहीं कर सके।
तुम हंसी थे बहुत इसलिए
हमनें पलकें झुकाई नहीं
दिल्लगी भी नहीं कर सके,
अलविदा भी नहीं कर सके।
इश्क तुमसे था कुछ इस कदर
और दुनिया का डर वो अलग
हम बयां भी नहीं कर सके,
और मना भी नहीं कर सके।
जिम्मेदारी थी हम पे बहुत
पांव दहलीज तक ही रहे
हम खुदा भी नहीं बन सके
गलतियां भी नहीं कर सके।
इश्क, इज्जत, दुआ, बद्दुआ
लोक निंदा या केवल पिता
मसअला बस बिगड़ता रहा
फैसला भी नहीं कर सके।
प्रज्ञा शुक्ला, सीतापुर
Kavyarpan
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