हाथों की कलम

हुँ मै तेरी हाथों की कलम
गढ़ ले तु गीत नया जोगन।
हर शब्द हो तीर लक्ष्य भेदी,
मुक्त हो प्रेम का अटुट बंधन।

आँखो के कोरो मे बसा ले,
बना प्रित का स्वच्छ अंजन।
मधुर चमन खिले पाक ईश्क का
बागवां मे दहके सूर्ख सुमन।

मन मन्दिर मे बसुं बन मुरत,
खुशियों मे झुमे तेरी मुदित नयन।
हुँ मै तेरी हाथों की कलम।
गढ़ ले तु गीत नया जोगन

योगेन्द्र कुमार निषाद,घरघोड़ा (छ.ग.)

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

जंगे आज़ादी (आजादी की ७०वी वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर राष्ट्र को समर्पित)

वर्ष सैकड़ों बीत गये, आज़ादी हमको मिली नहीं लाखों शहीद कुर्बान हुए, आज़ादी हमको मिली नहीं भारत जननी स्वर्ण भूमि पर, बर्बर अत्याचार हुये माता…

Responses

New Report

Close