ग़ज़ल

“ हद से बढ़ जाए कभी गम तो ग़ज़ल होती है ।
चढ़ा लें खूब अगर हम तो ग़ज़ल होती है ॥“

इश्क़ है—रंग , हिना—हुस्न ; याद है : खूशबू ।
फिर भी भूले न तेरा गम तो ग़ज़ल होती है ॥

कौन परवाह किया करता है आगोश में यहाँ ।
याद में आँख हो पुर—नम तो ग़ज़ल होती है ॥

लब—औ’–रुखसार ……….. ‘मरमरी वो बदन ।
संग मिल जाएँ पेंच-औ’-खम तो ग़ज़ल होती है ॥

चुप हो धड़कन ———- जुबां खामोश मेरी ।
चले वो ख्वाब में छम-छम तो ग़ज़ल होती है ॥

ख्वाब पलकों पे सिसकते हैं अरमाँ बहते हैं ।
हो एहसास में ‘गर दम तो ग़ज़ल होती है ॥

याद कर – याद भी कर तेरा सिमटना मुझमें ।
आह ! होठों पे जाए जम तो ग़ज़ल होती है ॥

उदास रात के गमगीन साये में अक्सर ।
पिरोये नींद कोई गम तो ग़ज़ल होती है ॥

न खुशी — न कोई रंज, न शिकवा ‘अनुपम’।
निकले न फिर भी दम तो ग़ज़ल होती है ॥
: अनुपम त्रिपाठी
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5 Comments

  1. Ankit Bhadouria - March 16, 2016, 10:06 pm

    lajwab…….naam ki tarah lines b Anupam !!

    • Anupam Tripathi - May 6, 2016, 4:40 pm

      अंकितजी , हार्दिक आभार।वो , क्या है कि; ज़नाब शेक्सपियर कह गये हैं——नाम में क्या रखा है ? आपको काम पसंद आया——मेरे लिए यही तोहफा़ है।दिल से निकली रचना दिल और दिमाग़ के तार झनझना दे—– यही तो उसकी सार्थकता और सफ़लता है।आपका साथ बहुत सुखद रहेगा——–मेरा विश्वास है।

  2. Panna - March 17, 2016, 11:51 pm

    behatreen janaab!

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