ज़ेहन में बैठे

ज़ेहन में बैठे कई अफ़सोस है
बोलते सन्नाटे जुबां खामोश है

अब वज़ूद कछुए का मिट गया
बाज़ी जीतता सोता खरगोश है

राजेश’अरमान’

Related Articles

*दोस्ती*

*****हास्य – रचना***** कछुए और खरगोश की, पांच मील की लग गई रेस तीन मील पर खरगोश ने देखा, कछुआ तो अभी दूर बहुत है…

मुक्तक

खामोश नजरों के नजारे बोलते हैं! खामोश लहरों के किनारे बोलते हैं! मुश्किल है कह देना लबों से चाहत को, खामोश कदमों के इशारे बोलते…

Responses

New Report

Close