दुनियां कितनी बदल जाए
अगर इंसानों की तरह
प्रकृति में भी प्रतिस्पर्धा हो जाए
घोसले की जगह चिड़ियों की भी
अट्टालिकाएं बन जाए
फूलों में सुंदरता को लेकर
प्रतियोगिताएं हो जाए
वृक्ष भी अपने फलों के
आकार को चिंतित हो जाए
ये पर्वत गंगन चुंबी होने को
बस ईर्ष्या से जल जाए
एक होड़ लगी है जीतने की
अगर ये प्रकृति में आ जाए
इंसानों का धरती में
जीना मुश्किल हो जाए
अगर बदलते लोगों की तरह
ये प्रकृति भी बदल जाए
अगर ये प्रकृति भी बदल जाए
Comments
2 responses to “अगर ये प्रकृति भी बदल जाए”
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True
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Thanks
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