अजन्मे भ्रुण की व्यथा

मेरी अभिलाषा को थोड़ा-सा उङान दे दो
हे तात! मुझे मेरी पहचान दे दो
कबतक भटकती रहेगी मेरी आत्मा
यूँ करते रहोगे, कहाँ तक मेरा खात्मा
मुझको मेरा, खोया मुकाम दे दो
मेरे हौसलों को थोड़ा-सा उङान दे दो ।
तुझको जना, वो भी किसी की कली थी
जिसने राखी बांधा, तेरे लिए वो भी भली थी
तेरी भार्या भी किसी तात की परी थी
बता फिर मेरी क्या खता, एक एहसान दे दो
मेरे हौसलों को थोड़ा उङान दे दो ।
जब मैं चलुगी चहकेगा अंगना तेरा
गुलज़ार होगा जब खनकेगा कंगना मेरा
चुका दूंगी मोल इस जीवन का मैं
मेरी जिंदगी मुझे ही उधार दे दो
मेरे हौसलों को थोड़ा उङान दे दो ।
जाने से पहले दधी साग लाने कहूँगी
आते ही पानी, चाय लेकर दौङुगी
तेरे कहने से पहले सारा कुछ करूँगी
बस एक बार इस जहाँ का दीदार दे दो
मेरे हौसलों को थोड़ा उङान दे दो ।
मेरे जन्म से क्या परेशानी होगी
मेरी किलकारी से क्या हैरानी होगी
कुछ ऐसा जिऊँगी, नाम रौशन करूँगी
बस थोड़ी सी जमी, थोड़ा आसमान दे दो
मेरे हौसलों को थोड़ा उङान दे दो ।।

Comments

4 responses to “अजन्मे भ्रुण की व्यथा”

    1. Suman Kumari

      सादर आभार

    1. Suman Kumari

      सादर आभार

Leave a Reply

New Report

Close