इतना घमंड क्यों भरा है इन्सान में
मत जियो अभिमान’ में।
नफरत की बेल इतनी क्यों चढ़ा रखी है
कांटों की सेज क्यों बिछा रखी है
प्रेम के दीपक का तेल क्यों कम हो गया है
स्वाभिमान का कागज भी नम हो गया है।
अभिमान ही अभिमान भरा है
पैसे का रुआब पर्वत चढ़ा है।
चंद टुकड़ो की खातिर बिक रहा ईमान है
कितना औपचारिक हो गया इन्सान है।
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