अमावस की रात बना गया।।

गुंजाइश ही नहीं थी कि
चांद यूँ बदली में अपना मुँह
छुपा लेगा,
मुझे देखेगा और कुछ ना बोलेगा।
मेरी नाउम्मीदी को नकार कर
पूर्णिमा की अनघ चांदनी में संवर कर,
चला गया वो घने बादलों की बाहों में,
मेरी बेचैनी को और बढा गया पूर्णिमा के सुंदर यौवन को
अपने अप्रतिम वेग से
अमावस की रात बना गया।।

Comments

4 responses to “अमावस की रात बना गया।।”

  1. Praduman Amit

    बहुत ही सुन्दर रचना प्रस्तुत किया है आपने।

  2. अतिसुंदर भाव 

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