अमावस की रात

अमावस की रात है ,
सुलगते से जज्बात हैं।
एक दिया जलाकर करूँ रौशनी
वो कहते यह बात हैं।
दिया जलाकर मिटे अंधेरा,
मन के तम का क्या करूँ।
आज बाहर है रौशनी,
मन के तम से मैं ड़रुॅं।
मन का अंधेरा दूर कर दे,
ऐसा दिया कहाँ से लाऊँ।
मन को दे दे कुछ सुकून जो,
ऐसे पल कहाँ से पाऊँ।
दीप जलाए जब जग सारा,
मैं दिल जलाकर करती उजियारा॥
_____✍गीता

Comments

3 responses to “अमावस की रात”

  1. Satish Chandra Pandey

    बहुत भावपूर्ण रचना

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी

  2. बहुत ही सुंदर सारगर्भित भाव पूर्ण सृजन दीदी मां*🙏

Leave a Reply

New Report

Close