आँखों की दीवारों में नमी अब बैठने लगी

आँखों की दीवारों में नमी अब बैठने लगी
भीतर की सब कच्ची , दीवारे ढहने लगी !!

दर्द से अश्क़ो की मौजें , जब तड़पने लगी
दुखती हुई रग दिल में और भी दुखने लगी !!

तपती हुई आहे – दर्द जला ना दे दिल कहीं
साँसे लेके तेरा नाम,तुझे सजदा करने लगी !!

आने लगा जी में जी , साँसों को साँसे जैसे
मेरे जख्मो पे जब तेरी तस्वीर उभरने लगी !!

फलक के दामन पर मातम सा छाने लगा
निकल के दर्दे-दिल से सदा जब गूंजने लगी !!

इक शख्स को तड़पता देख के मेरे भीतर
मौत भी मेरी मौत के अब लम्हे गिनने लगी !!

रोया है दर्द-ए-दिल कागज पे पुरव अपना
लोगो की नजर जिसे ग़ज़ल समझने लगी !!

Comments

3 responses to “आँखों की दीवारों में नमी अब बैठने लगी”

  1. Dev Kumar (DK) Avatar
    Dev Kumar (DK)

    Asm

    1. Purav Goyal Avatar

      shukriya sahab ji housla afazai keliye

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