आग क्यूं उठती नहीं है……..
वो तो बैठे हैं किलों में,
घुट रहे हो तुम बिलों में
आग क्यूं उठती नहीं है,
आपके मुर्दा दिलों में!
जो थे रक्षक, वे ही भक्षक
आप केवल मात्र दर्शक!
हाथ पर बस हाथ रक्खे
क्यूं बने बैठे हो बेबस!
अब तो उट्ठो ऐसे जैसे
धरती कांपे जलजलों में
आग क्यूं उठती नहीं है…….!
देश सेवा के ये धन्धे
उजले कपड़ों में दरिंदे,
भेड़ियों से नौचते हैं
भ्रष्ट नेता और कारिंदे,
क्यूं नहीं तुम शेर बनते,
रहना है गर जंगलों में,
आग क्यूं उठती नहीं है…….!
बरसों से मिमिया रहे हो
कसमसाए जा रहे हो,
वेदना को घोट अंदर
कैसे जीये जा रहे हो,
क्यूं नहीं अब चींखते हो,
रूंध चुके अपने गलों से
आग क्यूं उठती नहीं है…….!
चल कि रणभूमि सजे फिर
ज्ञान गीता का बहे फिर,
उठ खड़ें हो सारे अर्जुन,
भ्रष्टाचारी सब हिले फिर,
मुक्त हो पावन धरा ये,
जालिमों से, कातिलों से
आग क्यूं उठती नहीं है…….!
……………सतीश कसेरा
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