satish Kasera, Author at Saavan's Posts

‘हर अश्क सोख लेता है…………….

‘हर अश्क सोख लेता है वो आंख से मेरे, रोने भी नहीं देता मुझे,  दर्द का सहरा…।’ ………………………………………..सतीश कसेरा »

‘इक दिल के टूट जाने से…….

‘इक दिल के टूट जाने से क्या—क्या नहीं टूटा, पायल तो रही पांवों में, घुंघरु नहीं रहे………..’ ………………………………………………….सतीश कसेरा »

आग क्यूं उठती नहीं है………

आग क्यूं उठती नहीं है…….. वो तो बैठे हैं किलों में, घुट रहे हो तुम बिलों में आग क्यूं उठती नहीं है, आपके मुर्दा दिलों में! जो थे रक्षक, वे ही भक्षक आप केवल मात्र दर्शक! हाथ पर बस हाथ रक्खे क्यूं बने बैठे हो बेबस! अब तो उट्ठो ऐसे जैसे धरती कांपे जलजलों में आग क्यूं उठती नहीं है…….! देश सेवा के ये धन्धे उजले कपड़ों में दरिंदे, भेड़ियों से नौचते हैं भ्रष्ट नेता और कारिंदे, क्यूं... »

‘मुफ्त फूलों के साथ………

‘मुफ्त फूलों के साथ बिकती है, खुश्बूओं में वजन नहीं होता।’ ………………..सतीश कसेरा »

‘यहां नहीं तो कहीं ओर ….

‘यहां नहीं तो कहीं ओर जल रहा होगा, किसी सूरज के मुकद्दर में, कोई शाम नहीं…।’ ……………..सतीश कसेरा »

घने अंधेरे भी बेहद जरुरी होते हैं….

घने अंधेरे भी बेहद जरुरी होते हैं….. घने अंधेरे भी बेहद जरुरी होते हैं बहुत से काम उजाले में नहीं होते हैं। उडऩा चाहेंगे जो पत्ते, वे झड़ ही जायेंगे वे आंधियों के तो मोहताज नहीं होते हैं। कूदती-फांदती लड़की को सीढिय़ां तरसें छत पे जब कपड़े नहीं सूख रहे होते हैं। डूबती कश्तियों को देख कर भी हंस देंगे बच्चे कागज से यूं ही खेल रहे होते हैं। हादसा, जैसे सड़क पर कोई तमाशा हो लोग बस रुक के जरा देख ... »

गमछे रखकर के अपने कन्धों पर….

गमछे रखकर के अपने कन्धों पर…. गमछे रखकर के अपने कन्धों पर बच्चे निकले हैं अपने धन्धों पर। हर जगह पैसे की खातिर है गिरें क्या तरस खाएं ऐसे अन्धों पर। सारा दिन नेतागिरी खूब करी और घर चलता रहा चन्दों पर। अपना ईमान तक उतार आये शर्म आती है ऐसे नंगों पर। जितने अच्छे थे वो बुरे निकले कैसे उंगली उठाएं गन्दों पर। जिन्दगी कटती रही, छिलती रही अपनी मजबूरियों के रन्दों पर। ……..सतीश कसेरा »

काटी है रात तुमने भी ले-ले के करवटें…….

काटी है रात तुमने भी ले-ले के करवटें देखो बता रही हैं, चादर की सलवटें। उधड़ेगी किसी रोज सिलाई ये देखना यूं इस तरहं जो लेकर अंगडाईयां उट्ठे। पहले ही हो रही है, बड़ी जोर की बारिश अब आप लगे भीगी जुल्फों को झटकनें। तस्वीर मेरी सीने पे रखकर न सोइये हर सांस मेरी नींद भी लगती है उचटने। एकटक न देख लेना कहीं डूबता सूरज मुमकिन है रात भर फिर वो शाम न ढले। ……….सतीश कसेरा »

आंगन तो खुला रहने दो………………….

झगड़ों में घर के, घर को शर्मसार मत करो आंगन तो खुला रहने दो, दीवार मत करो। मारे शर्म के आंख उठा भी सकूं न मैं अहसानों का इतना भी कर्जदार मत करो। हर ओर चल रही हैं, नफरत की आंधियां और आप कह रहे हो कि प्यार मत करो। लफ्जों की जगह खून गिरे आपके मुंह से अपनी जबां को इतनी भी तलवार मत करो। हंसती हुई आंखों मेें छलक आये न आंसू हर शख्स पे इतना भी तो एतबार मत करो। —————–सती... »

पसीना भी हर इक मजदूर का………….

कभी दीवार गिरती है, कभी छप्पर टपकता है कि आंधी और तूफां को भी मेरा घर खटकता है। चमकते शहर ऐसे ही नहीं मन को लुभाते हैं पसीना भी हर इक मजदूर का इसमें चमकता है। गए परदेस रोटी को तो घर सब हो गए सूने कहीं बिंदियां चमकती है न अब कंगन खनकता है। यूं ही होते नहीं है रास्ते आसान मंजिल के सड़क बनती है तो मजदूर का तलवा सुलगता है। ये अपने घर लिये फिरते हैं सब अपने ही कांधों पर नहीं मालूम बसकर फिर कहां जाकर उज... »

Page 1 of 512345