फिर कांप उठी धरती माता ,
अब और नहीं बस और नहीं ।
कितना कुछ मुझ पर लादोगे,
हूं दबी घुटी पर और नहीं।
सांसे लेना दुश्वार हुआ,
कोने कोने पर वार हुआ,
हर जगह तुम्हारी मनमानी, मेरा वजूद बाकी ना रहा ।
सोई थी बस अब जागी हूं ,
लो देख तमाशा और नया,
कभी बाढ़ बनके डर आऊंगी ,
कभी धरती को दहलाऊंगी ।
जब गुस्सा मेरा फूटेगा,
जवालामुखी आग उगलेगा।
ऐ इंसा मुझको भी समझो,
ऐसे ही यूं मनमानी ना करो।
वरना एक दिन पछताओगे फिर भूल सुधार न पाओगे निमिषा सिंघल
आवाज़ सुनो
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2 responses to “आवाज़ सुनो”
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Nice
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Good
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