इक अरसे से कोई ख्वाब नहीं देखा हमने।
जब से तुम गए आफ़ताब नहीं देखा हमने।।
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लफ्ज़ दर लफ्ज़ हम क्या क्या नहीं हुए थे।
पर खुद का लिखा किताब नहीं देखा हमने।।
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हमारी मौत के बाद सजती रहती है महफिले।
मगर जीते जी कभी ख़िताब नहीं देखा हमनें।।
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अब जिंदगी से नहीं है शिकवे शिकायत कोई।
बस अधूरे सवाल थे जवाब नहीं देखा हमनें।।
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जिसकों जैसा देखना चाहा वैसा देखा ताउम्र।
साहिल कभी खुद को खराब नहीं देखा हमनें।।
@@@@RK@@@@
इक अरसे से कोई ख्वाब नहीं देखा हमने।
Comments
9 responses to “इक अरसे से कोई ख्वाब नहीं देखा हमने।”
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Wah
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Thanks
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behatreen
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Thanks
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UMDA
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Thanks
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Good
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वाह बहुत सुंदर
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सुन्दर रचना
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