इक नज़्म है जिसे हरपल गुनगुनाता हूँ

इक नज़्म है जिसे हरपल गुनगुनाता हूँ
हर्फ़ हालातों में ढलकत कुछ कह देते है
कोई साखी है तेरे मैखाने में
मकरूज है जिंदगी तेरी मोहब्बत की
छिड़ी है जंग जज्बातों में आंखो से निकलने को
रंग ओ रोशनी की चाहत है किसको
क्या छुपा है जो मैं अब कहूँ तुझसे
Comments
5 responses to “इक नज़्म है जिसे हरपल गुनगुनाता हूँ”
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Wah! Kya baat he
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thanks
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thanks 🙂
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क्या छुपा है जो मैं अब कहूँ तुझसे
नज़्म ए जिंदगी हर रोज लिखे जाता हूँ………..simply behtareen !!-

dhanyabaad
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