तुम्हें गले लगाकर रोना था
इतना तो मेरा हक बनता था।
हाथ पकड़ के कुछ दूर तक चलना था
इतना तो मेरा हक बनता था।
रुक जाते कुछ देर हम बहला लेते दिल को
देर तक निहारते तुम्हें
इतना तो मेरा हक बनता था।
ऐसी क्या जल्दी थी तुम्हें जो चाय तक ना पी!
एक कप मेरे हाथ से पीते
इतना तो मेरा हक बनता था।
रुसवा किया मुझे, रुलाया मेरी मोहब्बत को
दो आँसू तुम भी बहा लेते लिपट कर
इतना तो मेरा हक बनता था।
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