इतना लंबा तो नहीं होता है चिट्ठी का सफर…………

हरे-भरे से थे रस्ते पहाड़ होने लगे
नदी क्या सूखी, इलाके उजाड़ होने लगे।
कौन से देवता को खुश करें कि बारिश हो
रोज चौपाल में ये ही सवाल होने लगे।
लकीरे खिंचने लगी रिश्तों में तलवारों से
जमीं के टुकड़ों को लेकर बवाल होने लगे।
इतना लंबा तो नहीं होता है चिट्ठी का सफर
कि आते-आते महीने से साल होने लगे।
कमर के साथ लचकती थी और छलकती थी
प्यासी उस गगरी में मकड़ी के जाल होने लगे।
नाम तक लेता नहीं है कभी उतरने का
कर्ज के पंजों में अब जिस्म हाड़ होने लगे।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~–सतीश कसेरा

Comments

7 responses to “इतना लंबा तो नहीं होता है चिट्ठी का सफर…………”

  1. Amit sharma Avatar
    Amit sharma

    Ati Sundar Kaavya!

    1. satish Kasera Avatar
      satish Kasera

      Thanks Amit Sharma

    1. satish Kasera Avatar
      satish Kasera

      Thanks Ankit

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

  3. Satish Pandey

    वाह वाह

  4. Satish Pandey

    सुन्दर कविता

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