जाने क्यों कुछ अल्फाज
सिसकते रहते हैं
हम तुम्हारी यादों में
महकते रहते हैं
यूं तो हमारी मोहब्बत की
पूजा करता है जमाना
पर जब भी हम एक होना चाहते हैं तो
लोग बेबुनियाद इल्जामों के खंजर भोंकते रहते हैं।
इल्जामों के खंजर
Comments
5 responses to “इल्जामों के खंजर”
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बहुत ख़ूब, हृदय के भावों को व्यक्त करती हुई बहुत सुन्दर रचना
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Dhanyawaad
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अतिसुंदर अभिव्यक्ति
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Dhanyawaad
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प्रज्ञा जी आपकी लेखनी बहुत स्तरीय गति से आगे बढ़ी है। इस लेखनी में सरलता है प्रवाह है और भाव पाठक के लिए सहज ग्राह्य हैं।
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