इस कागज़ी बदन को यकीन है बहुत


इस कागज़ी बदन को यकीन है बहुत
दफ्न होने को दो ग़ज़ ज़मीन है बहुत

तुम इंसान हो,तुम चल दोगे यहाँ से
पर लाशों पर रहने वाले मकीं* हैं बहुत

भरोसा तोड़ना कोई कानूनन जुर्म नहीं
इंसानियत कहती है ये संगीन है बहुत

झुग्गी-झोपड़ियों के पैबन्द हैं बहुत लेकिन
रईसों की दिल्ली अब भी रंगीन है बहुत

वो बरगद बूढ़ा था,किसी के काम का नहीं
पर उसके गिरने से गाँव ग़मगीन है बहुत

बस एक हमें ही खबर नहीं होती है
वरना ये देश विकास में लीन है बहुत

*मकीं-मकाँ में रहने वाला

सलिल सरोज

Comments

6 responses to “इस कागज़ी बदन को यकीन है बहुत”

  1. Devesh Sakhare 'Dev' Avatar
    Devesh Sakhare ‘Dev’

    बहुत ख़ूब ज़नाब

  2. ज्योति कुमार Avatar
    ज्योति कुमार

    bahut khub ..
    kya bat hai

  3. दीपिका वर्मा "साहिबा" Avatar
    दीपिका वर्मा “साहिबा”

    शानदार

  4. Abhilasha Shrivastava Avatar
    Abhilasha Shrivastava

    Too good. Sorry for a very late appreciation

  5. राम नरेशपुरवाला

    Good

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