कुछ खार जमाने में हर चमन में होते हैं,
चुभते हैं जिस्म को लहूलुहान कर देते हैं,
तो कुछ खार लफ्जों से घायल कर देते हैं,
उन खारों से कोई जाकर पूंछे, क्या उन्हीं का स्वाभिमान है सर्वो परि?
बाकी सबका क्या कोई वजूद नहीं,उनका कोई स्वाभिमान नहीं,
कुछ भी कह देने से कोई अपमान नहीं!
सब क्या माटी के ढेले हैं उन सम कोई महान नहीं,
अरे प्रज्ञा! जाकर उनसे कह दो हम सब ईश्वर की कठपुतली हैं,
इस दुनिया में सब आते हैं,सबको निश्चित दिन जाना है,
इस कालचक्र के फेरे से तो बचता कोई भगवान नहीं..फिर खार तो खार हैं, नश्वर हैं,
दामन छेदकर नष्ट हो जाएगे,बस उनके दिए जख्म़ ही यादगार रह जाएगे…
ईश्वर की कठपुतली
Comments
7 responses to “ईश्वर की कठपुतली”
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Nice Thoughts
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बहुत ही सराहनीय प्रस्तुति
संसार में मनुष्य खाली हाथ आता है
और खाली हाथ ही चला जाता है बस लोग अच्छाई या बुराई से ही याद किए जाते हैं, अहंकार वैसे भी बहुत खतरनाक होता है अपने लिए भी दूसरों के लिए भी
अतिसुंदर भाव -

सचमुच, आपकी रचना वास्तविकता के करीब है।
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Atisunder
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Nice
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बहुत सुंदर लेखनी
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