उठे जब भी सवाल ज़िंदगी की तरफ
उठे है हाथ मेरे तेरी बंदगी की तरफ
महज इत्तफ़ाक़ था या और कुछ
मेरा इशारा है दिल्लगी की तरफ
वो हर जगह जो मोज़ू था मगर
नज़र पड़ी बस आवारगी की तरफ
उन किताबों से हासिल भला क्या
बढते है कदम किस तिश्नगी की तरफ
इन्तहा हुई हिस्सों में बटते बटते
अब चलें किसी पाकीज़गी की तरफ
राजेश’अरमान’
उठे जब भी सवाल

Comments
2 responses to “उठे जब भी सवाल”
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kavita kheench le jaati he apni taraf!
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thanx
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