उस रोज़ से रात भी दिन सी लगने लगी है

उस रोज़ से रात भी दिन सी लगने लगी है,

जिस रोज़ से आकर वो मुझसे मिलने लगी है,

पहले तो सो जाता था मैं तसल्ली की बाहों में,

आज मेरी नींदों को बेचैनी सी जकड़ने लगी हैं,

अब जिसे देखूं उसी चेहरे में वो दिखने लगी है,

जब से मेरे भावों को बखूबी वो पढ़ने लगी है।।

– राही (अंजाना)

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2 responses to “उस रोज़ से रात भी दिन सी लगने लगी है”

  1. Mithilesh Rai Avatar

    सुन्दर रचना

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