जानते तो हैं लोग मुझे, पहचान अभी बाकी है !
चल रहा हूँ बड़ी देर से, पर एक उड़ान अभी बाकी है
कुछ मंजिले अभी दूर हैं, कुछ रास्ते अभी बाकी हैं
जो राह में आते पत्थर हैं, वो भी तो अपने साथी हैं
जब ज्ञात है कि मंजिल पास नहीं, फिर क्यों क्षण भर की आस नहीं
जो तूफ़ान है, वो थम जाएगा, वक़्त मेरा भी आएगा
चलता हूँ अपनी राह मैं, कुछ पाता कभी – कुछ खोता कभी
आँखोँ मे नित-नए स्वपन लिए, हँसता कभी – रोता कभी
जब भटक ही रहा है जग सभी, तो क्यों भला मैं निराश होऊं
अपनी पथ-भ्रमता के कारण, क्यों भला मैं उदास होऊं
माना कुछ शब्द है जो अनकहे से हैं और कुछ लब्ज़ है जो अनसुने से हैं
विजय गाथा की कुछ पंक्तियाँ, स्याही मै बदलना बाकी है
अब जान गया हूँ मैं यही कि मंजिल ही मेरी साथी हैं
कहता हूँ मैं फिर वही, कि एक उड़ान अभी बाकी हैं
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