तुम्हारे सुधर जाने की गुंजाइश ही नहीं थी
तो आखिर हम कोशिश कब तक करते !
रफ्ता-ऱफ्ता तुम पास आते गये
हम भला दूर कैसे रहते !
रोंका तुम्हें, समझाया तुम्हें
और भला हम क्या करते…
जब तुम्हें हमसे मोहब्बत ही नहीं थी
आखिर हम तुम्हें अपना कब तक समझते…
“एक तरफा मोहब्बत”
Comments
4 responses to ““एक तरफा मोहब्बत””
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बहुत सुन्दर,लाजवाब अभिव्यक्ति
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Thanks a lot dear
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बहुत सुंदर
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धन्यवाद
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