एक थी प्यारी निशा
कल्पना की तरह
नव आकर्षण लिए
सबकी ख़ुशी के लिए
उम्मीद भी न थी
साथ होगी कभी
देर से मिली सही
आई बनकर खुशी
हंसी मनमोहक सी
सबकी ही प्रिय बनी
उम्मीद सबकी ही थी
आई क्यूं ऐसी घड़ी
कई उड़ानें चढ़नी थी
मां की हिम्मत बंधी थी
पापा का पूरा संसार
आस पड़ोस की रौनक थी
संतान जिसे सभी चाहे
मुश्किल कहीं दिख पाए
चेहरा जो सबको भाए
अचानक क्यूं गुम जाये
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