एक रस होने की आस

वो पूर्ण शक्ति जब बिखर गया,

कण-कण में  सिमट गया ,

तब हुआ इस जग का निर्माण,

वो परमपिता सृजनकर्ता जो,

नित्य सूर्य बन अपनी किरणो से,

नव स्फूर्ति का जीवो में करता संचार,

वो ममतामयी चाँद की चाँदनी बन,

स्नेहिल शीतलता का आँचल फैलाए,

हम जीवो को सहलाता,

टिम-टिम तारो के मंद प्रकाश में,

नयनो में निद्रा बन समाता,

खुली नयनो के अनदेखे सपने,

ले आगोश में हमें दिखाता,

पूर्ण प्रेम जो कण-कण में बिखरा,

एक रस होने की आस जगाता,

तनमयता. को प्रयासरत जीव,

घुलने को, मिटने को,

आपस में जुड़ने को,

पूर्ण प्रेम को पाने को,

व्यथित हुआ है जगत में,

जीव अपना अस्तित्व बनाने को,

इसी धुन में जन-जीवन चलता,

तन मिलता, मन नहीं जुड़ता,

कण-कण में जब बिखरा है,

वो कैसे मिले जमाने को ।।

Comments

8 responses to “एक रस होने की आस”

    1. Ritu Soni Avatar

      Thanks a lot DEEPAK ji

  1. Anjali Gupta Avatar

    Beautiful poem Ritu 🙂

    1. Ritu Soni Avatar

      Thanks a lot Sridhar ji

    1. Ritu Soni Avatar
      Ritu Soni

      Thanks a lot Ajay ji

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