एैसा श्रंगार कर

कुन्दन सा बदन को एैसा श्रृंगार कर ।
जो भाये पिया मन एैसा श्रृंगार कर ।

सरगम पे सुर नया कोई झंकार कर,
जो गुंज उठे हर मन के द्वार द्वार पर।

रीझाती सपनों को अपना सकार कर,
जो तु बना सके बना ले जीत या हार कर।

तारूण्य मन झुमे एैसा नयन वार कर,
तडफे हर मन एैसा वशी मंत्र संचार कर।

सावन बन प्रेम का रिमिझम फुहार कर,
दु:ख का बोझ हो तो चल यही उतार कर।

हुक की सरीता हो ह्रदय में फिर भी प्यार कर,
यही सुरम्य है जीवन, ” योगेन्द्र “इसे स्वीकार कर।

योगेन्द्र कुमार निषाद
घरघोड़ा (छ.ग.)

Comments

2 responses to “एैसा श्रंगार कर”

  1. Abhishek kumar

    Nice

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