ए जीनेवाले सोच जरा….!

जीनेवाले सोच जरा….!

मरने के लिए जीते हैं सब,
फिर भी मर मर कर जीते हैं.
यहाँ कभी मन की प्यास बुझी,
प्यासे ही सब रह जाते हैं.

जीनेवाले सोच जरा,
ऐसा जीना क्या जीना है,
गर मर मर कर यूं जीना है,
तो जीकर भी क्या करना है.

जग जीवन के जन्जालों मे,
ना समझ सका ख़ुद को मानव,
चिंताओं व्यर्थ व्यथाओं की,
गाथाओं मे खोया मानव.

कुछ ऐसे दीवानेपन में,
मेरे भी जीवन मे इक दिन,
जागा जीवन का अर्थ नया,
जब किस्मत से अनजाने मे,
ख़ुद ’  को खोया,
सबकुछ पाया……….!

               विश्व नन्द.

 

Comments

9 responses to “ए जीनेवाले सोच जरा….!”

  1. Panna Avatar

    nice poem विश्व नन्दजी

    1. Vijayanand V Gaitonde Avatar

      Thank you so very much Panna JI . Aapkaa protsaahan bahut aanand daayi …! 😉

  2. Ajay Nawal Avatar
    Ajay Nawal

    sach me sochne pe majboor kar deti he aapki kavita..

  3. Ankit Bhadouria Avatar
    Ankit Bhadouria

    यहाँ कभी न मन की प्यास बुझी,
    प्यासे ही सब रह जाते हैं…..bht khobb

  4. Tej Pratap Narayan Avatar
    Tej Pratap Narayan

    NICE

  5. राम नरेशपुरवाला

    Good

  6. Satish Pandey

    वाह वाह, अति सुंदर

  7. Satish Pandey

    Atisundar

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