Author: Vijayanand V Gaitonde

  • मेरे जीवन का हर इक पल .! (भक्तिगीत)

    मेरे जीवन का हर इक पल …….! (भक्तिगीत)

    मेरे जीवन का हर इक पल,
    तेरा ही अधिकार,
    कर ले तू स्वीकार,
    हे प्रभु, तू ही मेरा आधार…….

    नाम तेरा मन मन जपता हूँ,
    ज्ञान तुम्हीसे ही पाता हूँ,
    काज तेरे करता रहता हूँ ,
    दान तेरा पा खुश रहता हूँ ,
    जो लेता तेरा लेता हूँ ,
    जो देता तेरा देता हूँ
    कृपा तेरी हो, जीवन मेरा,
    हो तुझको उपहार,
    तू ही मेरा आधार …….

    प्यार तेरा, मेरा अमृत है,
    जो भी तू दे, सब स्वीकृत है,
    इसीलिये दुःख कठिनाई में,
    मन ना माने हार,
    तू ही सँवारे भार,
    तू ही मेरा आधार …….

    भावभक्ति से जीवन जागूँ,
    नित्य तेरे भजन गुन गाऊं,
    नाम भक्ति में खोता जाऊं
    चरणों तेरे मोक्ष मैं पाऊँ,
    मन की यही कामना मेरी,
    कर दे तू साकार,
    तू ही मेरा आधार…………

    मेरे जीवन का हरइक पल,
    तेरा ही अधिकार,
    कर ले तू स्वीकार,
    हे प्रभु, तू ही मेरा आधार…….

    ” विश्व नन्द “

  • Independence Day

    Independence & the day; as it was in 2013 & now in 2019

    INDEPENDENCE DAY ….!
    Independence of the country & its citizens is
    Not to be regarded by elected leaders as authority & license (to)
    Do whatever greedy, unholy acts they want to indulge in nuisance (but)
    Entails a great responsibility on their part for all their deeds & actions
    Provides freedom & liberty to them to do as they ought for the nation
    Engage continuously in activities for benefit & upliftment of its citizens (&)
    Nation building for real unity, progress, peace & prosperity of the union
    Developing profound brotherhood & love within all sections in the country,
    Enlightened clean living of self, setting as an example in sincerity & honesty
    Nurturing & demonstrating in all aspects high individual & national character
    Commanding for country respect & power in comity of Nations of high order
    Enlightened Democratic Strong Nation of Citizens in dignity caliber & character…..!
    (2013)
    Day is now to review how our leaders in power have (mis)managed this far the country
    And hold them responsible for the cowardice, corruption, sins, greed they manifested in polity
    Yet we must combine to throw such leaders out constitutionally to save degradation of country ….!
    (2019)
    Day is now to appreciate how since’14, PM/his NDA team have managed this country better
    And helped eradicating the cowardice, corruption, sins, greed that manifested in polity earlier
    Yet now they need full support of honest nationalist citizens to make the country far superior ..!

    “Vishvnand”

  • अच्छे दिन…!

    अच्छे दिन…!

    अच्छे लोग तो
    खुश हो ही रहे हैं
    अच्छे दिनों से ..!.

    आशा बहुत
    अच्छा जो हो रहा है
    और भी होगा…!

    बुरे लोगों के
    बुरे दिन आये हैं
    बरबादी के …!

    ना सुधरेंगे
    फंसे हुए जो हैं ये
    घूस लेकर …!

    सजा मिलेगी
    लूटा देश जिन्होंने
    उन्हें जरूर ..!

    देश भक्ति के
    दिन अब आये हैं
    खुशहाली के ..!

    ” विश्वनंद”

    An attempt at Haiku in Hindi (5,7,5).

  • The “getting free” lure …..!.

    The “getting free” lure …..!.

    A young family,
    Mr. John, his wife, two kids,
    Doing well for themselves,
    Staying in a small bungalow,
    Found one morning,
    Their new car missing,
    Stolen from garage
    where it was parking.

    Very upset, disheartened
    they investigated, searched,
    looked everywhere
    But the car was no where.

    “Immediately complain to the police”,
    was neighbors advice, sound
    & they helped them lodge an FIR,
    with all details of the right kind.

    John & family were now praying,
    For the Police for quickly finding
    The Car, which like a family member,
    they were greatly missing,
    Wife & kids helpless & crying….

    While the police, were as usual,
    still busy (or lazy) investigating,
    & calling them often for interrogating
    To the surprise of them all,
    On the 3rd day Morning,
    They found, their car, back
    Parked in the same place,
    From where it went missing,
    And more so without any damage,
    which was amazing & heartening.

    And to a greater surprise,
    There was a prominent note,
    Left in the car, in bold, reading:-

    “We working on a secret National mission,
    utilized your car in a holy operation
    Sorry for the inconvenience,
    Hope you pardon us in the situation,
    But as our obligation,
    Here are 4 free movie tickets,
    It will be to our great satisfaction,
    If you & your whole family enjoy,
    As from us, this humble reparation”
    Note was signed by Head of the mission

    Mr. John & family
    felt moved by this gesture from the mission
    Delighted that their car did work in a noble operation
    Were also more happy,
    As the free classy tickets were for,
    Highly Acclaimed, 4 ½ hour running,
    none other movie than the famous “Gandhi”
    Getting any tickets for this movie then was not easy

    The whole family
    in due gratitude, did go for the movie,
    Enjoyed it fully,
    With no cut backs on interval snacking,
    Returned feeling full & very happy,
    For the movie was also a beauty…

    Unfortunately only to find on return,
    their house completely burgled
    in the period interim,
    with all household valuables missing…..!

    The burglars had nicely planned,
    what they had in mind…..!
    And the family was lured,
    into this free gift grind,
    of a horrible kind……!

    I am reminded of this story,
    Whenever I find people running to any degree,
    To acquire anything advertised as available free
    Without realizing nothing in the world is given free,
    One has to always spend very much more,
    Whenever anyone has acquired anything free.

    Better & always wise to buy whatever you want
    Of the right quality & of the right kind,
    Paying its appropriate price with wisdom in mind,
    Never to fall a prey to free offers promoted by crooked minds

    Very sorry for this write, so lengthy
    For, even for reading anything free
    We have to spend,…. Expend our time,
    Time which is money, valuable very
    especially in these times
    When we are racing, always in a hurry ……!

    ” Vishvnand “

    (P.S.: This is a modified version & adoption from a happening, a news item; I recall reading in a newspaper abroad, in late 70’s. I get reminded of it due to the lure of free gifts & giveaway’s being flouted about galore presently to fool the public)

  • “नाम” में प्रभू के हम, मस्त हो के जी रहे ……! (गीत)

    नाम साधना के अभ्यास के दौरान उभरा हुआ यह गीत प्रस्तुत करने बहुत ख़ुशी महसूस कर रहा हूँ  ..!

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम,   मस्त  हो  के  जी  रहे ……! (गीत)

     

    हम  है  भक्त  “नाम”  के,   हम  तो  मस्त  हो  लिए,

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम,   विश्वमन  में  खो  लिए,

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम,   मस्त  हो  के  जी  रहे ……!

    “नाम” में   प्रभु  के  हम ,  मस्त  हो  यूं   गा  रहे ……!

     

    चिंता  कुछ  हमें  नहीं,   ना  हैं  हम  अस्वस्थ भी,

    प्रभू  के  भेजे  काज  हैं,   और  है  पास  वक्त  भी,

    प्रेम दृष्टि   से  ये  सब,   जग  निहारते  चले,

    हम  तो  मस्त  हो  लिए,

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम,   मस्त  हो  के  जी  रहे……!

     

    भक्ति  में  ये  शान्ति  और  मन  में  है  आनंद  सा,

    प्रभू  के  “नाम”  का  नशा,   जग  लगे  है  स्वर्ग  सा,

    देहबुद्धि  के  परे,   आत्मबुद्धि  से  जुटे,

    देहबुद्धि  के  परे,   आत्म ज्ञान  में  रमे,

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम,   मस्त  हो  के  जी  रहे……!

     

    विश्वमन  ही  शक्ति  है,   विश्वमन  ही  ज्ञान  है,

    सूक्ष्म  से  अनंत  तक  विश्वमन  ही  व्याप्त  है,

    सत्य  शिवम्  सुन्दरम,  विश्वमन  ही  तो  है,

    विश्वमन  का  स्पर्श  हम,   भक्ति  में  ये  पा  रहे ….!

     

    हम  तो  मस्त  हो  लिए,

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम,   मस्त  हो  के  जी  रहे……!

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम ,  मस्त  हो  यूं   गा  रहे…..!

     

    ” विश्व नन्द”

     

    (This “bhaktigeet” on Naam Sadhana , had got composed inspired by the beautiful lovely tune of the song ” Ham hain rahi pyar ke” from film “Nau Do Gyarah (1957)” and may kindly be considered as my humble tribute to the great revered Shri Sachin Dev Burman da.)

     

  • सारी दुनिया का यही, क्यूँ है ये हाल सही..….!(गीत)

    सारी दुनिया  का  यही,  क्यूँ  है  ये  हाल  सही..….! (गीत)

    सारी दुनिया  का  यही,  क्यूँ  है  ये  हाल  सही,
    बाँहों  में  और  कोई,   ख्यालों  में  और  कोई…
    ख्यालों  में  और  कोई,   बाँहों  में  और  कोई..….

    यारों,   जिसे  कहते  वफ़ा,   वो  क्या  है  वफ़ा  सही,
    वफ़ा  ख़ुद  से  बेवफाईi,   तो  ये  कैसी  वफा,  भाई….
    सारी  दुनिया  का  यही,  क्यूँ  है  ये  हाल  सही,
    बाँहों  में  और  कोई,   ख्यालों   में  और  कोई ……

    जाने  क्या  है  सही  यहाँ,   जाने  क्या  है  गल्त  यहाँ,
    जाने  क्या  है  बुरा  यहाँ,   जाने  क्या  है  भला  यहाँ,
    जाने  क्या  है  पुण्य  यहाँ,  जाने  क्या  है  पाप  यहाँ,
    पाप  क्यूँ  दिल  लुभाए,   रुलाये  क्यूँ  भलाई…….
    सारी दुनिया  का  यही  क्यूँ  है  ये  हाल  सही,
    बाँहों  में  और  कोई,   ख्यालों  में  और  कोई…

    जाने  ये  कैसे  हुआ,   झूट  ही  सच  है  यहाँ,
    जिसे  सच  कहते  सभी,   वो  तो  सच  है  ही  नहीं…..
    सारी दुनिया  का  यही,  क्यूँ  है  ये  हाल  सही,
    बाँहों  में  और  कोई,   ख्यालों  में  और  कोई…
    ख्यालों में और  कोई,   बाँहों  में  और  कोई..….
    ” विश्व नन्द ”

     

  • तेरे गीत प्यार के हैं सुख मेरा …..! (गीत)

    तेरे गीत प्यार के हैं सुख मेरा …..! (गीत)

    मै तो पहले गाता न था, गीत क्या है ये न जानता,
    तुझसे प्यार क्या हुआ, दिल मेरा चहक उठा,
    अब तेरे ही गीत गा रहा, तेरे गीत गुनगुना रहा …..!

    जाने क्या है पाया तेरी भोली आंखों में,
    रात दिन जो तरसूँ  मैं इन्हें ही  देखने,
    मुझपे अपनी रहम नजर कर ज़रा….!
    मैं तो पहले गाता न था….!

    कब से तेरे प्यार में  मैं जी रहा मगर,
    कैसे मानूँ तुझको  ही नहीं है ये ख़बर,
    मेरी दिल की बात दिल से सुन ज़रा ….!
    मैं तो पहले गाता न था….!

    अब तो तेरे गीत मैं  गाऊँगा जीते जी,
    चाहे प्यार की कदर ये  तूने की न की ,
    तेरे गीत प्यार के हैं सुख मेरा …..!
    मैं तो पहले गाता न था….!

    ” विश्व नन्द “

     

  • भजनों में, पूजन में, हे गणराजा … ! (भक्ति गान )

    भजनों में, पूजन में, हे गणराजा … ! (भक्ति गान )

    भजनों में, पूजन में, मगन है मन हमरा,
    हम और हमरा सबकुछ, हे गणराजा है तुम्हरा……!

    जो हमरा है आता, वो तोसे ही आता,
    जो हमरा है जाता , वो तोका ही जाता,
    हमरा ना यहाँ कुछ भी, बस तू ही इक हमरा,
    हम और हमरा सबकुछ, हे गणराजा है तुम्हरा……!

    हमरा लगता हम ही करते हैं सारा काम,
    काम में भूल जाते हम लेना तोरा नाम,
    तोरी कृपा से ही तो, चले काज ये सब हमरा,
    हम और हमरा सबकुछ, हे गणराजा, है तुम्हरा……!

    तोरी कृपा हो हमपर, तो हमरा है क्या कम,
    चरणों में प्रभु तोरे ही रहना चाहें हम,
    तोरी ही हो पूजा ये जीवन सब हमरा,
    हम और हमरा सबकुछ, हे गणराजा, है तुम्हरा……!

    भजनों में पूजन में, मगन है मन हमरा,
    हम और हमरा सबकुछ, हे गणराजा, है तुम्हरा……!

    ” विश्व नन्द “

  • दुनिया हमारे दम से है …..!( गीत )

    दुनिया हमारे दम से है …..!

    बदले हज़ार बार ज़माना तो गम नहीं,
    दुनिया हमारे दम से है, दुनिया से हम नहीं …..!

    क्यूँ फ़िक्र है तुम्हे मेरे यारों बेकार की,
    मंजिल मिलेगी आ के खुद, जो मंजिल का गम नहीं,
    दुनिया हमारे दम से है, दुनिया से हम नहीं …..!

    दुनिया की न परवाह, तो दुनिया बेजार है,
    आ कर मनाएगी तुम्हें, तुम मानो या नहीं,
    दुनिया हमारे दम से है, दुनिया से हम नहीं …..!

    चाहे सताए लाख ज़माना हमें तो क्या,
    खुशियाँ हमारे पास हैं, कहीं और तो नहीं,
    दुनिया हमारे दम से है, दुनिया से हम नहीं …..!

    बदले हज़ार बार ज़माना तो गम नहीं,
    दुनिया हमारे दम से है, दुनिया से हम नहीं …..!

    ” विश्व नन्द “

     

  • तेरे ही आसपास कल्पना कवि की है,…..! (गीत)

    तेरे ही आसपास कल्पना कवि की है,…..! (गीत)

    तेरे ही आसपास कल्पना कवि की है,
    कल्पना कवि की है, वंचना कवि की है,
    वंचना कवि की है, वंदना कवि की है ……..!

    तू स्फूर्ति है कवि की, प्रणयमूर्ती तू ही है,
    तू ही कमी कवि की, और तू ही पूर्ति है
    तेरे ही आसपास कल्पना कवि की है……!

    कितने कवि जगाये तूने, उच्चपद चढा दिए,
    कितने कवि बनाए, जो कि बन के व्यर्थ हो गए,
    तू ही उदय कवि का, और तू ही अस्त है ….!

    तूने खिलाये फूल ही जो कविह्रदय मे खिल रहे,
    तूने कभी यही चमन उजाड़ दिया है,
    तू आस है कवि की, और तू ही प्यास है,
    तू ख़त्म हो सके न ऐसा उपन्यास है….!

    तू मित्र है कवि की और तू ही शत्रू है,
    तू वफ़ा बेवफाई का संगम पवित्र है,
    तेरे ही आसपास कल्पना कवि की है……!

    ये कवि का गीत है, और ये नारी का रूप है,
    ये कवि का रूप है और ये नारी का गीत है,
    भगवन ने जो रची है, कविता, तू ही तो है…!

    तेरे ही आसपास कल्पना कवि की है,
    कल्पना कवि की है, वंचना कवि की है,
    वंचना कवि की है, वंदना कवि की है ……..!

    तेरे ही आसपास कल्पना कवि की है ….!

    ” विश्वनन्द “

     

     

     

  • चला खुद को लेकर न जाने कहाँ …!

    चला खुद को लेकर न जाने कहाँ …!

    चला खुद को लेकर न जाने कहाँ,
    अनजाना सफ़र ये, न जाना जहाँ ……!

    समझ जब ये आया, समझता हूँ मैं,
    जाना समझता न कुछ भी यहाँ. ……!

    यहाँ जानना क्या और क्या जानूँ मैं,
    कहाँ किससे पूंछूँ समझ ये कहाँ. …….!

    इसी भ्रम में लेकर हूँ खुद को चला,
    न जानू क्या खोया, क्या पाया यहाँ …..!

    ये क्या सोचकर मैं भी लिखता हूँ ये,
    क्या लिखकर पता कुछ मिलेगा यहाँ …?

    उम्मीद में हूँ पता कुछ चले
    कहाँ मेरी मंजिल और मैं हूँ कहाँ ……!

    ” विश्व नन्द “

  • बेकार की ये बेचैनी है …..!

    अपनी  बेचैनी और घबराहट की निरर्थकता पर उभरी हुई इस  रचना ( गीत) को  इसके podcast के साथ प्रस्तुत और share करने बहुत खुशी महसूस कर रहा हूँ  ……

     

    बेकार की ये बेचैनी है ….!

    बेकार की ये बेचैनी है,
    बेकार की सब घबराहट है,
    तुम इससे विचलित मत होना,
    ये अपने सोच की खामी है …..
    रहता इनमें कुछ तथ्य नहीं,
    मन की ही ये मनमानी है,
    मन की ही ये शैतानी है……!

    सोचो ये कौन ठिकाना है,
    ये जग ही मुसाफिरखाना है,
    यहाँ कुछ भी न हमको पाना है,
    ना कुछ भी हमरा जाना है,
    प्रकृति का खेल समझने को,
    प्रकृति के नियम निभाना है…….!

    इतना सारा सब पास जो है,
    हमे और की काहे जरूरत है,
    सब सुख है इसमे, पास जो है,
    इतना ही ज्ञान जरूरी है..……….!

    ख़ुद के ही शांत विचारों से,
    प्रकृति के दोष समझना है,
    काम क्रोध और मोह को तज,
    हमे अंहकार से बचना है,
    हर साँस प्रभु के नाम को स्मर,
    सुख मे ये जीवन जगना है……..!

    ये कामधाम जो सामने हैं,
    ये प्रभु के भेजे काज ही हैं,
    तन्मय हो, प्रेम से इनको कर,
    (पूजा ही समझकर इनको कर)
    प्रभु को ही अर्पण करना है…….!

    प्रभुप्रेम मे ओतप्रोत हो यूं,
    हमे प्रेम की वर्षा बनना है,
    बेकार की इस बेचैनी को,
    बेकार की हर घबराहट को,
    सत्ज्ञान के सुख मे बदलना है…..!

    मेरे मन कुछ तो सोच ज़रा,
    बेचैनी और घबराहट क्यूँ …
    बेचैनी और घबराहट से,
    बिलकुल न हमे अब डरना है ………!

    ” विश्व नन्द “

  • कभी कभी, तुम राहें भूल कर…! (गीत )

     

    कभी  कभी, तुम  राहें  भूल  कर……! (गीत )

    कभी  कभी,   तुम  राहें  भूल  कर,
    मेरी  गलियों  मे  आया  करो….
    कभी  कभी  तुम  ख़ुद  को  भूल  कर,
    ज़रा  नजरें  मिलाया  करो…………!

    ख़ुद  में  इतने  खोये  हो,
    न  तुझको  कुछ  ख़बर,
    काम  के  सिवा,
    न  तुझको  आता  कुछ  नज़र,
    कभी  कभी,   सारे  काम  भूल  कर,
    ज़रा  दुनिया  को  देखा  करो…..
    कभी  कभी,   बेवजह  ही  सही,
    दुनिया को निहारा  करो……
    कभी  कभी,   तुम  राहें  भूल  कर,
    मेरी  गलियों  मे  आया  करो……..!

    दिन  ये  जिंदगी  के,
    यूं  ही  बीत  जायेंगे,
    बीत  जो  गये,
    कभी  वो  फिर  न  आयेंगे,
    कभी  कभी,   तनहाइयों  मे  तुम,
    ज़रा  इसकी  भी  सोचा  करो…..
    कभी  कभी,   तनहाइयों  मे  तुम,
    ज़रा  मेरी  भी  सोचा  करो….
    कभी  कभी,   तुम  राहें  भूल  कर,
    मेरी  गलियों  मे  आया  करो….!

    जिंदगी  का  अर्थ,  प्यार,
    और  कुछ  नहीं…
    दिल  किसी  को  देना ही,
    इसीलिए  सही…
    कभी  कभी,  सारे  बन्ध  तोड़  कर,
    मेरी  बाँहों  मे  आया  करो,
    कभी  कभी,   तुम  सब  को  भूल  कर,
    मेरी  बाँहों  मे  आया  करो….
    कभी  कभी,  तुम  राहें  भूल  कर,
    मेरी  गलियों  मे  आया  करो……!

    कभी  कभी….!

    ” विश्व नन्द “

  • Retirement का सुकून ……..!

     

    Retirement  का  सुकून  ……..!

    अब सुकून आ गया है जिन्दगी मे थोडा,
    जब से मैंने औरों संग दौड़ना है छोडा…
    जब से मैंने औरों जैसा दौड़ना है छोडा…

    अब तो वक्त मिल रहा है, कुछ तो ख़ुद के वास्ते,
    सोचने, मैं कौन हूँ  और  कौन से हैं रास्ते…..

    लग रहा है सब नया, जो दृष्टि कुछ नयी मिली,
    पहले जैसी दुनिया भी है, लगती अब नई नई ……

    भा रहा निसर्ग जैसे स्वर्ग ही यथार्थ ये,
    मुक्त मन जो हो गया है, व्यर्थ के स्वगर्व से,
    मुक्त मन जो हो गया है, अर्थहीन स्वार्थ से …..

    वक्त जो गुजर गया है, उसकी न परवाह है,
    हाथ मे समय बचा है, पल पल उससे प्यार है ….

    हूँ अलिप्त मैं मगर, सर्व में जुटा हुआ,
    दलदलों में देख कमल, सुंदर सा जी रहा……..

    अब जो राहें चल रहा हूँ, कुछ तो ख़ुद चुनी हुईं,
    हर छलांग पे यहाँ हैं, मंजिलें नयीं नयीं……

    बाजी ख़ुद से है यहाँ, इंसान पूर्ण बनने की,
    दिन-ब-दिन नया नया प्रयोग, ख़ुद ही करने की……

    है कठिन ये राह फिर भी चलने में सुकून है,
    ना किसीसे दोस्ती न दुश्मनी की शर्त है……

    पास कुछ नहीं जो मेरे, खोने का मैं भय धरूँ,
    ज्ञान ये हुआ कि ज्ञान ही बटोरता फिरूं……

    ये है ऐसी राहें, जिनको भी मेरी तलाश है,
    मंजिलें ये ऐसी, जिनको मेरा इंतजार है,
    मंजिलें ये ऐसी जो मेरे ही आसपास हैं……

    अब सुकून आ गया है जिन्दगी मे थोडा,
    जब से मैंने औरों संग दौड़ना है छोडा…
    जब से मैंने औरों जैसा दौड़ना भी छोडा……

    “ विश्व नन्द “

     

  • अहसास का अहसास …!

    अहसास  का  अहसास  …!

    मुझे   अहसास  हो  रहा  है,

    कि  मेरा  दिल  मेरे  काबू  मेंना मेरे  पास,

    भटक  रहा  हैजाने  क्या  आस  लिए

    तेरे  ही  आसपास.…….

    मुझे  अहसास  हो  रहा  है.

    कि  ये  दुनिया  कितनी  सुंदर  और सुनहरी है,

    और  ये मेरी  जिंदगी  कितनी  प्यारी  और हसीन  है,

    वक्त  की  भी  कुछ  कमी  नहीं  है,

    फिर  भी  मेरे  दिल  को  तड़पने  की  ही  है  चाह,

    जाने  क्या  है  इसकी  कमी

    किसकी  है  इसको  तलाश …..

    एक  अजब  सा  अहसास,

    मेरे  ही  अहसास  पर,

    जो  मुझे  उलझन  मे  डाल  जाता  है,

    कि  सबकुछ  है  पासफिर  भी,

    हर  खुशी  है  साथफिर  भी,

    ये  दिल  क्यूँ  अक्सर  हो जाता , प्यासा  प्यासा,

    निशब्द  और  उदास…..

    मुझे  अहसास  हो  रहा  है,

    मानो  अब  विश्वास  ही  हो  गया  है,

    कि  मेरा  दिल  रहेगा  मेरे  काबू  मे,   ना  मेरे  पास,

    भटकता  ही  रहेगाजाने  क्या  आस  लिए,

    तेरे  ही  आसपास,

    जिसकी    मुझे  पहचान  है,  

    पता  भी  है  पास….

     

     

     

                          “विश्व नन्द

  • ये चली कैसी हवा ….!

    ये  चली  कैसी  हवा ….!

    सोचा  था  खरीदार  बन,

    आया  हूँ  इस  जहाँ  मे  मैं,

    ये  चली  कैसी  हवा, कि  बिकता  ही  चला  हूँ  मैं…..….   ! .

    जाना  था  मुझको  कहाँ, और,

    आ  गया  किस  मोड़  पर,

    अपनी  चाहतों  को  दूर  ही कहीं  पे  छोड़  कर,

    कि  अपना  कहने  को  ख़ुद  ही  को,

    ख़ुद  से  ही  डरता  हूँ  मैं, ये  चली  कैसी  हवा,

    कि  बिकता  ही  चला  हूँ  मैं …..…!. .

     

    पास  है  सबकुछ  मेरे, पर  फ़िर  भी  जाने  क्या  कमी,

    भाग  दौड़  के  भंवर  में, सूझता  भी  कुछ  नहीं,

    क्या  मुझे  पाना  है, जिससे  बेचता  हूँ  ख़ुद  को  मैं…

    ये  चली  कैसी  हवा, कि  बिकता  ही  चला  हूँ  मैं ……..….   ! .

     

    उलझने  दिल  की  न  सुलझीं, कोशिशें कितनी थी कीं,

    दिल  कहीं  है  और,

    ख़ुद  को  ढूँढता  हूँ  मैं  कहीं, बाट  तू  मुझको  दिखाए,

    बाट  ही  तकता  हूँ  मैं…..

    ये  चली  कैसी  हवा, कि  बिकता  ही  चला  हूँ  मैं………! .

    सोचा  था  खरीदार  बन, आया  हूँ  इस  जहाँ  मे  मैं ….? .

     

    “ विश्व नन्द ”

  • A poem, I want to write ….!

     A poem, I want to write ….!

     

    I have been longing…

    To write a poem…

    A poem, I am unable to write…..!

     

     I have tried it with all my intellect & might

     But for this art, neither intellect nor might seems right.

     

    Poetry, it is said, is a spontaneous overflow,

    Of powerful emotions;

    Of the dormant wonderful hidden inhibitions,

    That lies buried in our hearts……

    And come alive at moments, we never know about….

     

    Our hearts are like great oceans,

    Full of immense treasures and creations,

    Of everything in abundance,

    Pains, pleasures and sensations….

     

    I have it all, in my heart, to the full….

    But Oh! My God, why is the creativity in me so dull……

     

    A poem I want to write,

    I do not know, what about?

    But I am intensely longing….And am sure…

    Some day it will spring up, after all…

    A day in my life, I will cherish above all….

     

    Please don’t laugh,

    For who knows now….

    My poem may be an attempt at ‘You’

    To tell you, what I have never been able to tell you ….

     

                                            

     

                 ” Vishvnand “

  • सुंदर से इक फूल ने ….!

     सुंदर से इक फूल ने ….!

    कल  जैसा  था  वह  आज  नहीं,

    कल  कैसा  होगा  पता  नहीं,

    है  आज  अलग  इन  दोनों  से,

    हर दिन जैसे नव फूल  खिले.

    पर  दिल  अपनी  मनमानी  मे,

    जाने  कैसी  शैतानी  मे,

    इस  सुंदर  आज  को  छोड़,

    यार, कल  मे  ही  है  रहता  उलझे… (या  बीता  हुआ  कलया  आनेवाला  कल)

    सुंदर से इक फूल ने उस दिन,

    चुपके से मुझे पास बुलाकर,

    कुछ मुस्काकर, कहा ये मुझसे

    ऐसे क्यों मुरझाये हो तुम,

    ऐसे क्यों घबराए हो तुम,

    ऐसा भी है तुमको क्या गम,

    इतनी लम्बी उम्र तुम्हारी,

    फिर भी तुमको खुशी नहीं है ! मुझको देखो……

    कल मुरझा कर मर जाना है,

    आज का दिन जो मेरी जिंदगी,

    खुश रहकर और खुशी बाँट कर, सुन्दरता से ही जीना है…..”

    सुंदर से उस फूल ने मुझको सिखलाया है,

    अर्थ नया जीवन का अपने….

    कितने दिन जीवन मे काटे

    इसका तो कुछ अर्थ नहीं है,

    खुश रहकर और खुशी बांटकर,

    सुन्दरता से, साथ मे लेकर प्यारे सपने,

    निर्भयता से, जितने काटे, उस से ही मतलब है ………

    सुंदर से उस फूल ने मुझको सिखलाया है..

    सुंदर से उस फूल ने मुझको दिखलाया है….

    इसीलिए अय मेरे प्यारों,

    फूलों जैसा जियें हर इक दिन,

    प्यार करें पल पल से प्यारों,

    बचे हुए जीवन के हर दिन.

    आओ सब मिल साथ चलें यूं,

    हम अपने जीवन मे निशिदिन,

    सुन्दरता के बने पुजारी,

    सुंदर कर दें जीवनहर दिन ….…..

                        

    विश्व नन्द”

     

  • ए जीनेवाले सोच जरा….!

    जीनेवाले सोच जरा….!

    मरने के लिए जीते हैं सब,
    फिर भी मर मर कर जीते हैं.
    यहाँ कभी मन की प्यास बुझी,
    प्यासे ही सब रह जाते हैं.

    जीनेवाले सोच जरा,
    ऐसा जीना क्या जीना है,
    गर मर मर कर यूं जीना है,
    तो जीकर भी क्या करना है.

    जग जीवन के जन्जालों मे,
    ना समझ सका ख़ुद को मानव,
    चिंताओं व्यर्थ व्यथाओं की,
    गाथाओं मे खोया मानव.

    कुछ ऐसे दीवानेपन में,
    मेरे भी जीवन मे इक दिन,
    जागा जीवन का अर्थ नया,
    जब किस्मत से अनजाने मे,
    ख़ुद ’  को खोया,
    सबकुछ पाया……….!

                   विश्व नन्द.

     

  • दिल क्यूँ मांगो “More” ….!

     

     दिल क्यूँ  मांगो “More” ….!

    दिल तुम्हरी नहीं मानेगे हम, क्यूँ तुम मांगो “More”
    “More” “More”
    ही दुःख का कारण, सुख ले जावे चोर…..!

    इतना सारा पास जो अपने, देख तो उसकी ओर,
    जो कुछ है, इसमे ही समाया समाधान संतोष….. !

    भगवत्प्रेम और भक्तिभाव में होकर मन मदहोश,
    सुख है, जो है, उसका करना परिपूर्ण उपभोग,
    सुख है, जो है, उसका करना प्यार से सद्उपयोग …..!

    ये जीवन है प्रभु की पूजा, ठान ले तू हररोज,
    प्रभु का ही हर काम समझ, हर काम में आए जोश….!

    चीजों के इस “More” का चक्कर लेता सबको मोह,
    इस चक्कर में ना पड़नेकर बुद्धि का उपयोग ….!

    अंतर्मन सुविचार उभरते, नामस्मरण से रोज,
    सतज्ञान सुख की अनुभूति का अनुभव हो रोज…..!

    दिल प्यारे अब होश में आओ, और ना मांगो “More”
    जपो प्रभू का नाम प्यार से, जपना छोडो “More”….!

    विश्व नन्द

     

  • मेरी कविता प्यारी मुझको ….!

    मेरी कविता प्यारी मुझको…….!

    मेरी कविता प्यारी मुझको,

    औरों को ये सरदर्द है,

    समझ के भी आदत ना छूटे,

    जाने कैसा ये मर्ज है…….!

    फिर भी अर्ज है…!

    मेरी कविता प्यारी मुझको, औरों को ये सरदर्द है…..!

    कभी जो लब पर ये आ जाती,

    और कुछ पंक्ति मै लिख पाता,

    फिर जो कोई पास हो मेरे,

    पकड़ सुनाने उसको लगता,

    मचले मेरा दिल तब ऐसे,

    जैसे मेरा यही फर्ज है,

    मेरी कविता प्यारी मुझको,औरों को ये सरदर्द है,

    समझ के भी आदत ना छूटे, जाने कैसा ये मर्ज है…….!

    जाने कविता या हो विन्मुख,

    इससे न कुछ फर्क है पड़ता

    दोस्त भी भागें दूर हैं मुझसे,

    जब चढ़ता ये जोश कवि का

    बात यही बीवी बच्चों की

    इससे न कुछ उन्हें अर्थ है

    मेरी कविता प्यारी मुझको, औरों को ये सरदर्द है,

    समझ के भी आदत ना छूटे, जाने कैसा ये मर्ज है…….!

    माँ जैसे अपने बच्चोंसे प्यार है करती,

    जैसे भी हों.

    मेरा प्यार भी ऐसा ही है,

    मेरी कविता जैसी भी हो.

    पर लोगों को इसका क्या है,

    उनको तो ये समय व्यर्थ है.

    सुना रहा पर मैं कवितायें, जैसे मैंने लिया कर्ज है…..!

    मेरी कविता प्यारी मुझको, औरों को ये सरदर्द है,

    समझ के भी आदत ना छूटे, जाने कैसा ये मर्ज है…….!

     

      “ विश्व  नन्द

  • हरदम कौन ये मेरे दिल में…..!

    हरदम  कौन  ये  मेरे  दिल  में…..

    हरदम  कौन  ये  मेरे  दिल  में, सुख  में,  

    दुःख  में,  हर  मुश्किल  में,

    हर्ष  में  मेरे,   या  अश्कों  में, गीत  मजे  से  गाता  है,

    शब्द  कहाँ  से  लाता  है,  

    धुन  भी  लेकर  आता  है …….

    हरदम  कौन  ये  मेरे  दिल  में, गीत  मजे  से  गाता  है……..

    कभी    समझा,     समझूंगा, कौन  है  ये,  

    क्या  नाता  है,

    क्यूँ  इसने  इस  मेरे दिल  को  अपना  ही  घर  माना  है,

    इसकी  क्या उम्मीद  है  मुझसे,  

    मुझमे  क्या  ये  पाता  है,

    जो  अनजाने  में  अर्पित  सा  हर  गीत  उमड़  कर  आता  है,

    शब्द  कहाँ  से  लाता  है,   धुन  भी  लेकर  आता  है…….

    हरदम  कौन  ये  मेरे  दिल  में, गीत  मजे  से  गाता  है……..

     

    कहते  लोग  ये  गीत  मेरे  हैंये  सच  यारों  बात  नहीं,

    चाहे  हो  ये  लेखन  मेरा,  शब्द्सुधा  ये  मेरी  नहीं,

    मुख  मेरे  आयी  हो  कविता,  

    पर  ये  गुंजन  मेरा  नहीं  है,

    मुझमे  ही  रहकर  जो  मुझसे  अलग  अलग  सा  रहता  है,

    वो  ही  सबकुछ  करता  है,

    शब्द  कहाँ  से  लाता  है,  

    धुन  भी  लेकर  आता  है…….

    हरदम  कौन  ये  मेरे  दिल  में, गीत  मजे  से  गाता  है ……..

                             ” विश्व नन्द

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