कड़वी दास्ताँ..

कुछ लोग रोटियाँ सेकने आ गए जब जलने लगा मेरा मकाॅं।
किसी के नुकसान की ,
यही है कड़वी दास्ताॅं।
बुझाने आग ,
एक हाथ भी नहीं आया ।
देने को मेरा साथ,
कोई साथ भी नहीं आया।
तमाशा बना दिया है जख़्म को मेरे
देखने सब आते हैं,
कोई मरहम नहीं लाया॥
_____✍गीता

Comments

4 responses to “कड़वी दास्ताँ..”

  1. Rohit

    Bahut khoob

    1. Geeta kumari

      Thank you Rohit ji

  2. Satish Chandra Pandey

    बहुत सच्चाई भरी मार्मिक कविता

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी

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