कमाल है कवि आज के ।।

कमाल है कवि आज के ।
पंडित है शब्द साधक खुद को कहते है ।
दूसरों को शब्दों से पीड़ा पहुँचाते है ।
खूद को ग्यानी, सर्वश्रेष्ठ कवि कहते है ।
कमाल है कवि आज के ।।1।।

हम क्या है?
हमारी औकात क्या हिन्दी के आगे ।
खूद को हम युवा कहते दूसरों की ना निंदा करते ।
यही हमारी लेखनी का वरदान है ।
यही हिन्दी का ग्यान है ।।2।।

माता के आगे बालक सदा छोटा ही सुहाता है ।
बड़़ा होकर क्या करेगा खुद को बर्बाद करेगा क्या ?
संस्कृत हो या हिन्दी, उर्दू हो या फारसी ।
सब माता ममता के आगे फीका है ।
जिसे भाषा पे अहंकार है,
वह हिन्दी का संतान कहाँ ?
कवि विकास कुमार

Comments

2 responses to “कमाल है कवि आज के ।।”

  1. Satish Pandey

    विकास जी, कविता लिखने और कवि बनने के लिए शब्द साधक तो बनना ही पड़ता है। पहले शब्दों को शुद्ध रूप में लिखना सीखना होता है, तब किसी साहित्यिक मंच में कविता लिखनी होती है, फिर खुद को कवि माना जाता है। यदि शब्द और वाक्य अशुद्ध हों तो वह कविता नहीं, भाषा के साथ अन्याय है।
    आपके द्वारा लिखी गई इस कविता में आपने इतनी अशुद्धियां की हैं–
    1- शीर्षक में ही गलती है, ‘कमाल हैं’ होना चाहिये था।
    2- खुद को खूद लिखा है।
    3-ज्ञानी को ग्यानी लिखा है।
    4-हम क्या हैं? लिखने की बजाय हम क्या है? लिखा है।
    इसलिए कविता से पहले भाषा तो सीखनी ही चाहिए। आपने लिखा है -वह हिन्दी का संतान कहाँ ? सही बात है जब कोई हिंदी को विकृत रूप में लिखे तो उसे क्या कहेंगे।

  2. Rajiv Mahali Avatar

    विकास जी आपके पास शब्द तो है मुझे लगता है है टाइपिंग में दिक्कत हो रही है आप voise टाइप कर एक बार देख सकते सकते हैं आप अच्छा कर सकते हैं इसमें कोई dought नहीं
    दोस्त लगे रहो

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