विकास कुमार's Posts

यदि तेज की तलाश हो तो अपने वीर्य को गंदी जगहों पे निवेश करने के बजाय उसे एक सही दिशा दें तो आप ब्रह्मचारी कहलाने के योग्य होंगे ।। जय श्री राम ।।

संतरूपी कविजन आप हमारी खामियाँ को पढ़कर हमे खूब कोसे खूब परेशान करे, अच्छी बात है लेकिन कोई व्यक्ति इस संसार में किसी भाषा का पूर्ण ज्ञाता नहीं होता । वैसे आज कवियों की भरमार लगी है दुनिया में, लेकिन कवि का काम लिखकर कुछ कमाना और सांसारिक झूठी ऐश्वर्य प्राप्त करता नहीे होता, बल्कि शिक्षक और कवि समाज का दर्पण होता है । वैसे गर्व की बात है कि हमारे देश में संतकवि कबीर, तुलसी, कालि, रहीम और मीराबाई ज... »

कमाल है कवि आज के ।।

कमाल है कवि आज के । पंडित है शब्द साधक खुद को कहते है । दूसरों को शब्दों से पीड़ा पहुँचाते है । खूद को ग्यानी, सर्वश्रेष्ठ कवि कहते है । कमाल है कवि आज के ।।1।। हम क्या है? हमारी औकात क्या हिन्दी के आगे । खूद को हम युवा कहते दूसरों की ना निंदा करते । यही हमारी लेखनी का वरदान है । यही हिन्दी का ग्यान है ।।2।। माता के आगे बालक सदा छोटा ही सुहाता है । बड़़ा होकर क्या करेगा खुद को बर्बाद करेगा क्या ? ... »

गाँव मातृ-पिता समाज से बना ।।

होत धन के तीन चरणः- दान प्रथम अतिउत्तम है । द्वितीय भोग स्वयं बचाव है । विनाश तृतीय चरण है । होत धन के तीन चरण ।। यदि धन का व्यय मौलिक आवश्यकता पर हो,तो यह मार्ग अतिउत्तम है । और यदि धन का मालिक भोग-विलास में रमा हो,तो यह राह अति निंदनीय है । ये नहीं कर सकते धन का दान, क्योंकि ये है स्वभाव है दुराचार । इसी तरह होते है, दुर्जनों के धन का नाश और ये व्यर्थ ही रोते है दिन और रात । होत धन के तीन चरण ।।... »

प्रभु जी मेरो उध्दार तो करो

प्रभु जी मेरो उध्दार तो करो जन्म-जन्म की पापीनी मैं मेरा निस्तार तो करो । प्रभु जी मेरो उध्दार तो करो ।। अहल्या तो तुमने तारा, ग्यान दियो तुमने तारा को । मंदोदरी है भक्त तिहारा । । प्रभु जी मेरो निस्तार तो करो ।। मोक्षदायक है प्रभु नाम तेरो । गणिका अजामिल भी तर गयो, सुमिरन कियो तोरो नाम तो ।। प्रभु मेरो उद्धार तो करो ।। जन्म-जन्म की पापिनी हूँ मैं, प्रभु जी अब दरश तो दिखाओ । प्रभु जी मेरो निस्तार ... »

– मैंने व्यर्थ ही जिन्दगी गँवायो रे!

मैंने व्यर्थ ही जिन्दगी गँवायो रे! कभी राम नाम लिया तो नहीं । मैंने व्यर्थ ही जिन्दगी गँवायो रे! नर तन लेकर इस जहां में आया नारायण को पाने को । भोग-विलास में रमा रहा । याद न आया कभी नारायण को ।। मैंने व्यर्थ ही जिन्दगी गँवायो रे! कभी राम नाम लिया तो नहीं । मिथ रिश्ते-नातें में मैं यूँही बँधा ही रहा । कभी साँचा रिश्ता याद आया ही नहीं ।। मैंने व्यर्थ ही जिन्दगी गँवायो रे! कभी राम नाम लिया तो नहीं ।।... »

कपड़े बदले, वेश बदला, बदला घर-संसारा ।

कपड़े बदले, वेश बदला, बदला घर-संसारा । माया-मोह में फँसा रहा तु नर पर बदल सका न अपना व्यवहार । रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2 तन को धोया नित-नित दिन तु, पर मन को धोया कभी नहीं अगर एक बार जो मन धो लो हो जाये तन तेरा शुद्ध । रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2 मन शुद्ध है तो तन शुध्द है, आहार शुध्द तो विचार शुद्ध है । जल शुद्ध है तो वाणी शुद्ध है, संगत शुद्ध तो रंगत शुध्द है । रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2... »

आजा-2 मेरे राम दुलारा ।।

कौसल्या का आँख का तारा, दशरथ राम दुलारा । कैकयी सुमित्रा का है तु सबसे प्यारा आजा-2 मेरे राम दुलारा ।। उर में तेरा भरत का वासा, संग में रहते लक्ष्मण न्यारा । शत्रुघ्न है तेरा सबसे प्यारा । आजा-2 मेरे राम दुलारा ।। हनुमान है तेरा भक्तों में निराला, और जपत रहत राम-नाम का माला ।। आजा-2 मेरे राम दुलारा ।। शक्ति है तेरी सीता मईया । भक्ति है तेरी सबरी मईया ।। आजा-2 मेरे राम दुलारा ।। प्रेम निश्चल है भक्... »

कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की

कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की मर्यादा राम की इस भू पे सीता की इस पवित्र जमीं पे कुछ तो सम्मान करो निज भू की । कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की ।। तेरे मात-पिता-भाई-बहन को पाला है, इस भू ने। अपनी छाती चीर-चीर के दिया है, तुझे अन्न-जल, मान व सम्मान रे! भूखे रह जाते तु, प्यासे मर जाते अगर भू-माता की कृपा ना होती । कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज र... »

एक शानदार टिप्पणी करने को जी चाहता है ।

एक शानदार टिप्पणी करने को जी चाहता है । आपकी बातों को जिन्दगी में उतारने को जी चाहता है । कमबख्त! जिन्दगी किस रूख पे आकर खड़ी है । उसे लौटाने को जी चाहता है । किसी की हँसी को मुहब्बत समझा, उसकी परिणाम भुगतने को जी चाहता । वह गैर की दुनिया में खुश, हमें भी खुश रहने को जी चाहता है । तोड़ के सारे बंधन अब नयी, जिन्दगी जीने को जी चाहता । उसे कैसे कहूँ तेरे साथ बिताये ? हर एक लम्हा भुलाने को जी चाहता है... »

वह रहने वाली महलों में, मैं लड़का फुटपाथ का ।

वह रहने वाली महलों में, मैं लड़का फुटपाथ का । उसकी हर एक अदा पे मरना यही मेरा जज्बात था । वह रखने वाली टच मोबाईल, मैं लड़का कीपैड वाला । उसकी हर एक अदा पे मरना यही मेरा जज्बात था । वह पहनने वाली सांडिल है, मैं लड़का नंगे पाँव वाला । उसकी हर एक अदा पे मरना यही मेरा जज्बात था । वह लड़की नयी ख्याल की, मैं लड़का पुराने ख्याल का । उसकी हर एक अदा पे मरना यही मेरा जज्बात था । उसके पाँव पायल शोभे, मेरे पा... »

ठहरो-ठहरो इनको रोको, ये तो बहसी-दरिन्दें हैं ।

ठहरो-ठहरो इनको रोको, ये तो बहसी-दरिन्दें हैं । अगर इसे अभी छोड़ डालोगे. तो आगे इसका परिणाम बुरा भुगतोगे ।। ठहरो-ठहरो इनको रोको, ये तो बहसी-दरिन्दें हैं । बहसी-दरिन्दें को बख्सना देश हित में ठीक नहीं, ये तो सजा के हकदारी है. इन्हें देश हित में सजा देना ठीक हैं ।। ठहरो-ठहरो इनको रोको, ये तो बहसी-दरिन्दें हैं । लूट लेते हैं ये किसी के बहु-बेटियों के आबरू को और उन्हें जिन्दा दफना देते है, ये है इसकी द... »

पत्थर को पूजते-पूजते थक गये हम कई वर्षों से ।

पत्थर को पूजते-पूजते थक गये हम कई वर्षों से । पर क्या खाक मिला हमें, तुझसे ओ बेवफा मुहब्बत करने से ।। पत्थर को पूजते-पूजते थक गये हम कई वर्षों से । उनको मुहब्बत मिले जहां मे, जो तेरे हुश्न गुलाम हो ।। हम तो सिर्फ दिल-ही-दिल में चाहें, क्योंकि तु न बदनाम हो । पत्थर को पूजते-पूजते थक गये हम कई वर्षों से ।। तु मेहरबां जो मुझसे होते, बदनसीब हम न होते । कट जाती यूँही जिन्दगानी खुशियों से, हम दुःखी ना ह... »

रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।

रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं । मात-पिता को छोड़ अब वह सुत प्यारा, अब तो सास श्वसुर के पास रहते हैं । रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं । इधर-पिता माता अन्न-जल को तरसे, उधर वह सास-श्वसुर को मालपुआ खिलाते है । इधर मात-पिता झोपड़ी में बसर करते, उधर ससुराल में वह भवन बनाते है । रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं । इधर भाई मूर्ख वरदराज पडें है, उधर साले साहब को कालिदास बनाते... »

अपनी अदा देखाकर हुश्न के बाजार में मेरा भाव लगाया तुमने।

अपनी अदा देखाकर हुश्न के बाजार में मेरा भाव लगाया तुमने। मिल गया कोई रईसजादा तो इस मुफलिस गरीब को ठुकराया तुमने।। मेरी मुफलिसी का औकात दिखाया तुमने । रईसों के महफिल में मेरा मजाक उड़ाया तुमने ।। मेरी मुफलिसी का औकात दिखाया तुमने । पत्थऱ समझके ठुकराया तुमने। खिलौना समझके खेला तुमने।। मेरी मुफलिसी का औकात दिखाया तुमने। वफा के हर मोड़ पर बेवफाई निभाई तुमने। अपनी निगाहों का सहारा देकर, गैरों को निगाहो... »

नये लोग, नयी शहर, नयी जहां मुबारक हो तुम्हें ।

नये लोग, नयी शहर, नयी जहां मुबारक हो तुम्हें । जहां की सारी खुशियाँ झुके तेरे कदम,ये दुआ है मेरे ।। नये लोग, नयी शहर, नयी जहां मुबारक हो तुम्हें ।।1।। लगे तेरे नसीब की हर एक बला हमें, मााँगु रब से यही दुआ मैं । न आये तेरे नसीब में वो घडी कभी, जो तुझे मेरी जरूरत पडे ।। नये लोग, नयी शहर, नयी जहां मुबारक हो तुम्हें ।।2।। जिये जहाँ में तु जहां के साथ मुस्कुरा के सदा । न छूटे तेरे लबों की हँसी वो कभी ।... »

अर्थ जगत का सार नही, प्रेम जगत का सार है ।

अर्थ जगत का सार नही, प्रेम जगत का सार है । प्रेम से ही टिकी हुई, धरती, गगन, भुवन है ।। अर्थ जगत का सार नही, प्रेम जगत का सार है । अर्थ के कारण रिश्ते बनते अब और अर्थ के कारण रिश्ते टूटते अब । पर अर्थ जगत का सार नही, प्रेम जगत का सार है । अब क्या ख्याल जगत का है । लोग सिर्फ धन के पीछे भागते है । और प्रेम से मुँह मोड़ते है । पर अर्थ जगत का सार नही, प्रेम जगत का सार है । दुर्जन के पास जो धन है, वो ऐय... »

ख्याब टूटी, दुनिया लूटी, बिखड़े सभी सहारे ।

ख्याब टूटी, दुनिया लूटी, बिखड़े सभी सहारे । अपनों ने गैर कहा, और गैरों ने अपने । । यहीं है, जहां की दस्तुर पुरानी, बची है कुछ आसें ।।1।। टूटे के बिखड़ जाते, सभी मतलब के रिश्ते । मतलब से ही याद करते जहां में, लोग अपने हो या पराये ।। यहीं है, जहां की दस्तुर पुरानी, बची है कुछ आसें ।।2।। अब ना कोई किसी का मात-पिता, भाई-बहन, पत्नी-पुत्र व कोई रिश्ते । आशा के बंधन में बँधे रहते है, ये एक-दूसरे के संगे ... »

स्वेच्छाकृत प्रदान की गई वस्तु नहीं कहलाते दहेज रे!

स्वेच्छाकृत प्रदान की गई वस्तु नहीं कहलाते दहेज रे! माँग की गई वस्तु ही तो कहलाते है दहेज रे! स्वेच्छाकृत प्रदान की गई वस्तु नहीं कहलाते दहेज रे! मात-पिता के द्वारा दी गई वस्तु कहलाते है वरदान रे! और माँग की गई वस्तु ही तो कहलाते है अभिशाप रे ! स्वेच्छाकृत प्रदान की गई वस्तु नहीं कहलाते दहेज रे! अमीर हो या गरीब हो दहेज दोनों के लिए घातक रे! क्योंकि इसके कारण मरती युवतियाँ अविवाहित रे! स्वेच्छाकृत ... »

भारत के युवा जो एक दिन भगत,आजाद बनना चाहते थे ।

भारत के युवा जो एक दिन भगत,आजाद बनना चाहते थे । आज वो युवा कौन-से देश की शोभा बढ़ा रही है । वो वीरांगनी झाँसी जिस पे हमे गर्व होता था । आज वो वीरांगनी प्रदेशों से मेल खा रही है ।।1।। शिक्षित होने का अर्थ आज के बुद्धजीवियों ने खूब लगाया है । निज राष्ट्र को धिक्कार कर प्रदेशों में अपना घर बनाया है । दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद जी भी तो थे विद्वान । अरे! भाई जब वो लोग अपने देश को नहीं भूले आखिर ... »

परतंत्रता की बेड़ियाँ जो थी, वो हमारे महान क्रान्तकारी तोड़ गये ।

परतंत्रता की बेड़ियाँ जो थी, वो हमारे महान क्रान्तकारी तोड़ गये । स्वतंत्रता की नीब को जो खाक़ में मिलाना चाहता था, वो खूद ही जमीं में सिमट गये । बाकी जो हिन्द को अधीन करना चाहता था, उसको हमारे धरतीपुत्रों ने सुला दिया । भारत की जमीं है यारों बंजर हो फिर भी सुपुत उगाती है, भारत का हर एक लाल मिट्टी को माता समझता है ।।1।। उस देश को मत कभी कमजोर समझना, जिस देश में हर एक युवा खूद को भगत सिंह कहते है ।... »

स्वतंत्रता की जश्न मनाऊँ

स्वतंत्रता की जश्न मनाऊँ या परतंत्रता की दास्तां सुनाउँ मैं । मैं भारत की धरती हूँ । क्या-क्या बताऊँ मैं? कुछ लोग जहां मे हमारी पूजन करते है, तो कुछ जहां में हमारी खण्ड को अपमानित करते है । सहती आई हूँ मैं सदियों से । मौन ही रहती हूँ सदा मै । लेकिन मेरे पुत्रों ने मेरी लाज बचायी है । कोई राम बनके, कोई कृष्ण, कोई बोस, आजाद तो कोई सिंह बनके । मेरी मिट्टी को मस्तक पे लगाया है । स्वतंत्र की जश्न मनाऊँ... »

लगाव नहीं जिस देश के युवाओं को राजनीति व अर्थशास्त्र के क्षेत्र में ।

लगाव नहीं जिस देश के युवाओं को राजनीति व अर्थशास्त्र के क्षेत्र में । वो कैसे जानेंगे हम किस व्यवस्था में जी रहे हैं और कैसी स्थिति है हमारी देश की? वो कैसे बदलेंगे कुव्यवस्था को और कैसे सुधार लावेंगे वो अपनी निज राष्ट्र में? जब उनको मालूम ही नहीं निज देश की क्या राजव्यवस्था और कैसी अर्थव्यवस्था है? वो खाक!-3 बदलेंगे अपने देश को? जब आज शिक्षा-व्यवस्था में विधुरनीति, चाणक्यसूत्र, चाणक्यनीति व कौटिल... »

जिस नर को अपनी धरा पे अपनी भोग की वस्तु उपलब्ध न हो ।।

जिस नर को अपनी धरा पे अपनी भोग की वस्तु उपलब्ध न हो ।। वह नर नहीं वह तो निज धरा की बोझ है । अगर उन्हें निज धरणी से प्यार नहीं । तो क्या उन्हें पर महि से प्यार होगी? जिस नर को अपनी धरा से प्यार नहीं, वह नर नहीं वह तो नररूप सम पशु समान है । ऐसे ही जन कहलाते जग में मातृपुत्र कलंक है । जो अपनी मातृभूमि की लाज न रख सकी, वह क्या पर मातृभूमि की सम्मान करेगी क्या? जो नर अपनी मातृभूमि की गरिमा को न बचा सकी... »

हम उस देश के वासी है ।।

हम भारत के वासी है, संस्कृति हमारी पहचान है । सारी जहां में फैली हुई, हमारी मान-सम्मान है । सादगी है हमारी सबसे निराली, अजब न्यारी है संस्कृति हमारी । प्रशंसक है सारी दुनिया हमारी, यही भारतभूमि की कहानी है हमारी ।।1।। हमारी संस्कृति है सबसे पुरानी, सनातन धर्म है हमारी । हिन्द, हिन्दु, हिन्दुस्तां पहचान है हमारी । धरती से जुड़ाव से हमारा. धरती माता है हमारी । हम अन्न उगाते है, इसलिए किसानी पहचान है... »

रोती धरती चिखता अम्बर, सारा जहां है सोता-सा ।

रोती धरती चिखता अम्बर, सारा जहां है सोता-सा । आज भी धरती रोती अपने पुत्रों के इच्छाओं पे । मारुत भी आज दुषित हो चुका है, मानव के व्यवहारों से । मानव अब मानव बनने को तैयार नहीं, अब तो यह दानव पथ पे अग्रसर है ।।1।। शुद्धता खो चुकी है जल मानव जैसे दानवों के व्यवहारों से । मानव आज अपनी मानवता से गिर चुकी है, अब वह दानव बनने पे अड़े है । प्रकृति को विनाश करने में नर का प्रथम हाथ है । जो नर नारायण की सम... »

ये कैसी है रीति ये कैसी है नीति?

ये कैसी है रीति ये कैसी है नीति? निज राष्ट्र की जनता भूख से हैं मरती । ये अन्न स्वयं उगाती फिर भी ये अन्न को क्यूँ तरसती? ये कर भी देती राष्ट्र को फिर भी ये राष्ट्र शसक्त क्यूँ नहीं बनती? ये कैसी है रीति ये कैसी है नीति? निज राष्ट्र की दुर्दशा अब मुझसे देखी नहीं जाती ।।1।। चारों तरफ भ्रष्टाचार-ही-भ्रष्टाचार अब देखने को मिलती । शांति कहाँ खो गई निज राष्ट्र की अब पता ही नहीं चलती । जाति-मज़हब-धर्म क... »

हम दीन-दुःखी, निर्बल, असहाय, प्रभु! माया के अधीन है ।।

हम दीन-दुखी, निर्बल, असहाय, प्रभु माया के अधीन है । प्रभु तुम दीनदयाल, दीनानाथ, दुखभंजन आदि प्रभु तेरो नाम है । हम माया के दासी, लोभी, भिखारी, दुर्जन, दुष्ट, विकारी प्रभु पापी है । प्रभु तुम माया के स्वामी, दाता-विधाता, निर्गुण,निर्विकार, सनातन पुरूष महान हो ।।1।। हम इन्द्रियों के दासी, भोगी-विलासी, कामी, आताताई,अग्यानी, दुष्ट मानव है। प्रभु तुम जितेन्द्रिय,गुणों के स्वामी,बुद्धिमान, सकल जगत के स्... »

कौन-सी नीतियों पे हमारी देश चल रही है?

कौन-सी नीतियों पे हमारी देश चल रही है? कौन-से व्यवस्था में हम जी रहे हैं? हर-जगह शोषण-ही-शोषण दिखाई दे रही है? आमजनता का बुरा हाल है इस देश में, और सरकार अपने ही नीति पे देश चला रही हैं ।।1।। किसी देश का उत्थान होता उच्च राजनीतिज्ञ के उच्च विचारों से, और अर्थव्यवस्था सुधरती महान अर्थशास्त्री राष्ट्रप्रेमी के महान अर्थनीति से, ये दो नर अगर देश का शुभचिंतक न हो देश का विकास संभव न हो ।।2।। अगर देश क... »

चिख-चिल्लाकर ही देशभक्ति दिखाई जा सकती है क्या?

चिख-चिल्लाकर ही देशभक्ति दिखाई जा सकती है क्या? जो मौन है कुछ बोलते नही, क्या वह देशभक्त नहीं है क्या है? जो चीखते है हम भगत है, वह भगत सिंह को जानते है क्या? कवि वीररस के हो या श्रृंगार-रस के सबके उर में होते निजी स्वार्थ । पर जो कलम के जोर से हटा दे देश से कुव्यवस्था और स्थापित करवा दें सच्चे वीर हिन्दुस्तानी क्रान्तिकारियों के तरह देश में सुव्यवस्था । वह है सच्चे हिन्दुस्तानी, वीरसिपाही भगत सिं... »

देश दुर्दशा वर्णन ।।

निज राष्ट्र की दुर्दशा अब कोई क्यूँ कहता नहीं? भारतेन्दु हरिश्चन्द्रजी कह गये भारत दुर्दशा, अब कोई कवि महाराज जी ऐसी कविता क्यूँ लिखते नहीं? अंग्रेजों ने हमारी मान-सम्मान व सारी मर्यादा को मिट्टी में मिला दी । देश की सारी-की-सारी सुव्यवस्था को कुव्यवस्था में तब्दील कर दी । यह क्रूर निर्दयी हिंसक पशु अत्याचारी, यह दुष्ट स्वभाव मानव कलंगी । इस बात से हैं हम सब वाकिफ़, फिर भी आज हम क्यूँ अपनाते इनकी ... »

।। दुषित व्यवस्था व वेतन की माँग ।।

।। दुषित व्यवस्था व वेतन की माँग ।। अब किसी मुद्दे पर प्रेम से बात से होती कहाँ? जो समाधान जनहित के लिए निकले किसी समस्या का । अब तो संसद में सिर्फ बहस ही छिड़ी रहती है । कुछ लोग बहुत अच्छे बोलते जनकल्याण के लिए, उन्हें चुप करा दिया जाता, अपने स्वार्थ कल्याण के लिए । वेतन-व्यवस्था की बात, कभी छिड़ती नहीं क्या संसद में? आमजनता की मौलिक-आवश्यकता तक पुरी नहीं होती इस देश में, और सिंहासनपति भौतिक-दुनि... »

आइनस्टाईन जी कहते हैः-

आइनस्टाईन जी कहते हैः- हम सबसे एक जैसा बात करते हैं, चाहे वह कुड़ा उठाने वाला बालक हो या चाहे वह किसी विश्वाविद्यालय का आचर्य हो कुल लोग जहां में मजदुर को हीन समझते हैं,इन्हें दलित वर्ग की श्रेणी देते है । इन्हें गलत-गलत कह-कहके ,इनके मनोबल को ठेस पहुँचाते हैं । इनके काम को काम नहीं, मजबुरी का नाम देते है । सच बात है तेरी दुनियावालों, लोग मजबुरी में ही मजदुरी करते है । इसका मतलब कदापि ये नहीं किः-... »

होते हम खूद ही दुःखों का जनक और मिथ्यारोपन लगाते गैरों पर ।

होते हम खूद ही दुःखों का जनक और मिथ्यारोपन लगाते गैरों पर । अपने व्यवहार प्रतिकूल संबंध बनाते, ये नहीं देख पाते हम । इसलिए तो जगह-जगह पे ठोकर खाते-फिरते हैं हम । निज स्वभाव भूलाके पर स्वभाव से सामंजयस स्थापित करने की कोशिश करते हम । अपनी निज स्वभाव भूलके पर स्वभाव से संबंध स्थापित करने में तुले रहते हैं हम इसीलिए तो जग में दुःखों को जन्म देने वाले प्रथम व्यक्ति कहे जाते हैं हम । प्रसन्नता खूद पे न... »

तेरे दर्द ने हमें इस तरह बेगाना किया ।

तेरे दर्द ने हमें इस तरह बेगाना किया । तुझे भूलाके हमने खूद को याद किया ।। अपनी पहचान भूलाके हमने साथ प्यार का सपना देखा । कमबख्त! तुने मुफलिस समझे मेरा प्रेम-प्रस्ताव अस्वीकार किया ।। खेले तुमने मेरे जज्बात से झू़ठी मुहब्बत किया तुमने । रंगीन-सी जिन्दगी में आखिर तुमने अपनी बेवफाई की रंग घोली ।। सीधे-सीदे जिन्दगी जी रहें थे हम, खूद में मस्त रहते थे हम ।। तुझसे मुलाकात क्या हुई? कमबख्त! तुने ऐसे-ही... »

मा समान नहीं जग में कोई ।।

मा समान नहीं जग में कोई ।। मा समान नहीं जग में कोई, पिता सम नहीं कोई महान । भाई जैसा न कोई साथी है, बहन जैसा न किसी का प्यार । आध अंग की स्वामिनी होती पत्नी व पुत्र होते पिता के शान । यहीं है आदर्श परिवार की शान, यहीं है इनका जीता-जागता संसार ।।1।। सत्य माता पिता ग्यान है, धर्म भाई बहन दया है । शान्ति पत्नी पुत्र क्षमा है व साधु है मेहमान स्वरूप । इनके न होते कोई नर मित्र और नाही शत्रु । ये हैं सत... »

तुम कर लो लाख कोशिशे हिन्द को बर्बाद करने की ।

तुम कर लो लाख कोशिशे हिन्द को बर्बाद करने की । चाहे कोई भी भयंकर कुटनीति अपनाओ तुम । हो सके तो तुम अपनी सारी शक्ति लगा दो । मगर हो नहीं सकता सदा असत्य का राज ।।1।। भला कुछ दिन तो जरूर असत्य की ज्वाला दहकती है गरीबों पे । मगर मेरे दोस्त सत्य की धधकती आग को कौन बुझाता है । जो बुझाता वह मिट्टी में मिल जाता है, खूद को पहचान नहीं पाता है। तुम कर लो लाख कोशिशे हिन्द को बर्बाद करने की ।। 2।। अगर लगता तुम... »

क्या लिखूँ जो दुनिया को भाये ।

गजल ।। क्या लिखूँ जो दुनिया को भाये । मैं नहीं तो क्या कोई तो भाये जहां को ।।1।। जहां को अगर लगते है शख्स वो प्यारे । तो मैं क्यूँ महफिल में सरेआम बदनाम हुँ ।।2।। बदनाम मैं नहीं तो क्या वो आम आदमी है । जो जिस्म के बाजार में मेहनत के रोटि खाते है ।।3।। जिनके ऊँची शान है, उनके बोल के भी कुछ दाम है । मगर जहां में फकीर के शान, सब मोल के महान ।।4।। यूँही लोग आज कुछ लिख देते है । लोग बेवजह झंझट मोल लेते... »

अंधियारा उजियारा का क्या संबंध है ?

अंधियारा उजियारा का क्या संबंध है ? जैसे जिन्दगी में कभी दुःखों का पहाड़ है । तो कभी पवित्र आँगन में बहार है । जैसे सावन में मेघ के जल धरा के लिए अमृतसमान है । वैसे ही जिन्दगी कभी अंधियारों का घर है । तो कभी उजियारा नर के संग है । नर के प्रारब्ध हरि के माया से भिन्न है । जो नर जैसे कर्म करत वैसे ही पल पायत है । नर के आगे सारे मान-हानि के प्रश्न है। पर कुछ मान के संग तो कुछ अपमान के साथी है। किसका ... »

सबके के सब मिट्टी के मोल है ।

सबके के सब मिट्टी के मोल है । पैसा, धन-दौलत किसके संग है । आज जो सड़क का भिखारी है । कल वह अपनी मुकद्दर का दाता है ।।1।। किसका क्या है जहां में ये किसने जाना है । जिसने जाना, उसने तब से जिन्दगी संभाला है । और के भरोसे जिन्दगी किसने कब-तक जिया है । और तो केवल कुछ दिन के मेहमान है, अपना हाथ करतार है ।।2।। कब-तक जिओगे जिन्दगी घुट-घुट के । यूँही कब-तक बर्बाद करोगे समय की इस धारा को । बहता चला गया जो ह... »

स्वतंत्रता की नीब को मिट्टी खा रही है ।

स्वतंत्रता की नीब को मिट्टी खा रही है । सरकार को देख आज जनता काँप रही है । जो एक दिन तपस्वी राजा राम की माँग कर रहे थे । आज वो जनता रावण को कैसे सिंहासनपति बना चुके है । स्वतंत्रता की नीब को मिट्टी खा रही है ।।1।। आजाद, बोस, तिलक, सिंह की कुर्बानियाँ । अब हम उस महान स्वतंत्रता सेनानियों का जन्मदिवस मना रहे है । शर्म की तो बात ये है, हम उनके साथ खड़ा होके अपनी धरा को अपमानित कर रहे है । जो लोग मिट्... »

माँझी के नाव चलता बीच मँझधार में ।

माँझी के नाव चलता बीच मँझधार में । उसे कोई विपरित धारा का प्रवाह रोकता नहीं । क्योंकि वह हर परिस्थिति में नाव को खेवा है । उसे सिर्फ मंजिल दिखता है, राह उसे बुलाता है ।।1।। राह-राह के हर कठिन परिस्थिति में उसने खूद को संभाला है । उसे विषम लहरे-तरंगे, ज्वाला क्या बुझाये, जो अपनी होश से चलता है । वह अपनी एक नई राह बनाता है, जिसे पाकर वह अपनी मंजिल तक पहुँचाता है । माँझी को लहरों से क्या लेना, उसे तो... »

वासना क्या है , ये जानना आज बड़ा सवाल बन चुका है ।

वासना की गंदी हवा बह रही है । चारों-तरफ अत्याचार फैल रही है । त्राहि-त्राहि करते संत आज जगत में । दुर्जनों की गर्जना धरा को दबा रही है । सज्जनों की चिख अंबर तक जा रही है । वासना की गंदी हवा बह रही है ।।1।। अब चारों तरफ भ्रष्टाचारियों अपना घर बना रही है । पग-पग मिलते है आज सज्जनों का रक्त । दुर्जनों आज सज्जनों के रक्त का पिपासु बन रहे हैं । कौन-कौन बने हैं आज दुर्जन ये पहचानना कठिन है । बड़े की तो ... »

निर्मल मन को भाते हर लोग है ।

निर्मल मन को भाते हर लोग है । चाहे वो नर गोरा हो या काला । इन्हें रंग भेद आता नहीं । इसलिए ऐसे लोग जहां में संत कहलाते है ।।1।। संतों की महिमा इस धरा पे धरती समान है । जैसे धरा नर के हर अपराध क्षमा करती । वैसे ही संतजन दुर्जनों को नेकी के सदा राह दिखाते । निर्मल मन को भाते हर लोग है ।।2।। मैला मन है जिसका उसके श्वेत तन से क्या लेना । जो नर मन के सच्चे नहीं, उसके तन से क्या भला । कर लो नर मन को निर... »

मत बर्बाद कर ए मेरे दोस्त नर तन

मत बर्बाद कर ए मेरे दोस्त नर तन बड़े ही जतन से मिले है ये मानुष-जन्म। कर ले दान-धर्म, दीन-दुःखी की सेवा कर । व्यर्थ मत गँवा जिन्दगी, कुछ तो ऐसे करम करें । जिसे सुफल हो तेरा मानव-जन्म ।।1।। क्यूँ कब तक खूद को अंधियारा के गलियों में भटकायेगा । खूद को पहचान मेरे दोस्त, समय को मत कोस दोस्त । खूद को पहचान कर, खूद को संभाल दोस्त । ऐसे में ही ना बीत जाए जिन्दगी तेरी । इसलिए समय के साथ चल मेरे दोस्त ।।2।।... »

दुर्जनों को सुख मिलता है सज्जनों को चिढ़ाके ।

दुर्जनों को सुख मिलता है सज्जनों को चिढ़ाके । ये उसके अपने प्राकृत स्वभाव है, बदलते नहीं बदलते है । इन्हें परनिंदा, दुसरों की पीड़ा से आनंद मिलता है । यह दुर्जनों का अपना स्वभाव है, इसलिए यह दुर्जन के वंशज है ।।1।। सज्जनों को दुखावस्था देखकर इसे परमानंद की अनुभूति होती है । यह सर्वदा गलत विचारों में विचरता है, इसे कोई संत नहीं भाता है । यह असंतों का संगी , दुराचारियों का साथी है । लोभी, भोगी, कामी... »

देहिक सुख के कारण मनुष्य आंतरिक शक्ति खोते है ।

देहिक सुख के कारण मनुष्य आंतरिक शक्ति खोते है । ब्रह्मचर्य व्रत को खंडित-खंडित करके अपनी जिज्ञासा पूरी करता है । और भी और भी सुख के कारण सारी शक्तियाँ गँवाता है । जो नर हरा सकते है सिंह को, आज वो हार की माला स्वीकारते है ।।1।। भौतिक सुख के कारण मन सदा विचरता रहता इन्द्रियों के जाल में । उसका क्या है, उसका तो मालिक ही भोगी है, इसलिए वह मन स्वतंत्र विचरता है । योगी का मन तो सदा रहता प्रभु के पद्चिन्... »

करो परिश्रम कठिनाई से

जहां की भीड़ में मतलबी लोगों के संग में । बहुत कुछ सीखने को मिलता है, वो है जिन्दगी । पर जिन्दगी के भी कुछ रंग है । बेरंग है जिन्दगी हमारी । ये कहती आज दुनिया किसी की ।।1।। आज जो चढ़ के बोले रहे है लोग । कल वो भी रोते थे अपनी मुकद्दर पे । प्रारब्ध के भी खेल निराले है । जो कभी नंगे पाँव जमीं को चुमते थे । आज को धरा को मिट्टी समझता है ।।2 ।। इन्सां का क्या है ? कुछ मिल गया तो हँसता है, कुछ खो गया तो... »

मैं आखिरी मुहब्बत का दस्तक दे रहा हूँ

मैं आखिरी मुहब्बत का दस्तक दे रहा हूँ । और वो गैर की बाहों में सोई जा रही है । मैं वफा की डोर में बंधा हूँ । और अब वह वेवफा की रश्में निभा रही है ।।1।। मैं आखिरी मुहब्बत का …… …….. …. … (1) इजहारे मुहब्बत की वो दिन बस ख्वाब बन रही है । टूट के रिश्ते अब समंदर की गहराई माप रही है । वेवफा नहीं है अगर वो तो क्या मेरे साथ वो वफा निभा रही है । तोड़ के रिश्ते अब वो गैर... »

शायरी संग्रह भाग 3

मेरे इलाही मेरे रक़ीब को सलामत रखना। वो भी रोयेंगे मेरे मह़सर में।।1।।  विकास कुमार कमति मेर रक़ीब मेरे माशुक को गुल दे दो। वो समझेंगे हमराह शव-ए-विशाल है।।2।।  विकास मेरे इलाही मेरे माशुक को मेरे रक़ीब से मिला। मैं चाहता, उनके चेहरे पर तब़सूम हो।।3।।  विकास कुमार किसी वज्म़ में मेरे रक़ीब ने मेरा कलाम सुनाया। सुनके अश्क भरे आये, मेरे महब़ुब की।।4।।  विकास कुमार मेरे मर्ग पर रोयेंगे मेरे रकीब ... »

शायरी संग्रह भाग 1

मुहब्बत हो गयी है गम से, खुशियाँ अच्छी नहीं लगती। पहले दुश्मन मुहब्बत करते थे, अब दोस्त नफरत करते हैं।।1।।  विकास कुमार कमति.. बदलते वक्त के साथ, उसकी आँखें भी बदल गयी। पहले मुहब्बत भरी निगाहों से देखती थी, अब शक भरी निगाहों से।।2।।  विकास कमार कमति.. सुना था लड़की बेवफा होती, मौलिकता गुण होती, उनके रगों में बेवफाई की। आज पता चला, मर्दों की मंडी में भी बेवफाई बिकती।। 3।।  विकास कुमार कमति.. संज... »

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