हर रीति रिवाज से परे
करूँ बस अपने मन का।
मन कहता मेरा
जो अपमानित करते
मेरे जननी जनक का ।
उनकी पहुँच से दूर
कहीं ले जाऊँ
करूँ बस अपने मन का।
कैसी खटास यहाँ घिर आई है
हर रिश्ते में दूरियाँ उभर आई है
उसमें मिठास घोल दू अपनेपन का
करूँ बस अपने मन का।
सहनशीलता तुम्हारा आभूषण
धीरता से सीचते आई घर- आँगन
खोते जा रही आपा अपना
दोष है उम्र के अंतिम पङाव का
करूँ बस अपने मन का।
करूँ बस अपने मन का
Comments
5 responses to “करूँ बस अपने मन का”
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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सादर आभार सादर आभार
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आपने अपने मन की बातों को कविता में बहुत अच्छे से ढाला है
कवि की अल्हड़पन की सोंच बहुत अच्छी है-

सादर आभार
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बहुत खूब
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