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कर प्रतिकार तू

नारी तू जो चाह ले रच दे नव संसार तू
होने वाले अपमान का करती क्यूँ न प्रतिकार तू ।।
कभी दाव पे लगा दिया खुद तेरे ही परमेश्वर ने
मौन हुए सब देख रहे, बिलखते छोङ दिया हर अपने ने
तेरे चीरहरण के साक्षी बनने थे सब तैयार खङे
कान बंद थे जैसे उनके, कैसे सुन पाते चित्कार तेरे
सोंच हृदय कंपित है मेरा, कैसे वे भारतवंशी थे
निर्वस्त्र होती कुलवधू, कैसे देख रहे, अत्याचार तेरे
सत्य शपथ तेरा था, क्यूँ करती क्षमा अपराध तू
होने वाले अपराधों का करती क्यूँ न प्रतिकार तू ।।
आज भी दुर्योधन-दुशासन जैसे लोगों की कमी नहीं
कर्ण सरीखे रणकुवरे की विषैली वाणी थमी नहीं
देख रहे हैं ऐसे कितने, जैसे हम इन्सान हैं ही नहीं
पशु भी शरमा जाये, घिनौनी हरकतें थमी नहीं
बाहर कदम पङे कैसे, सराफत नहीं बची हो जैसे
इन सरफिरो से डरो नहीं, दुर्गा-चण्डी की अवतार तू
होने वाले अपराधों का करती क्यूँ नहीं प्रतिकार तू ।।

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