नारी तू जो चाह ले रच दे नव संसार तू
होने वाले अपमान का करती क्यूँ न प्रतिकार तू ।।
कभी दाव पे लगा दिया खुद तेरे ही परमेश्वर ने
मौन हुए सब देख रहे, बिलखते छोङ दिया हर अपने ने
तेरे चीरहरण के साक्षी बनने थे सब तैयार खङे
कान बंद थे जैसे उनके, कैसे सुन पाते चित्कार तेरे
सोंच हृदय कंपित है मेरा, कैसे वे भारतवंशी थे
निर्वस्त्र होती कुलवधू, कैसे देख रहे, अत्याचार तेरे
सत्य शपथ तेरा था, क्यूँ करती क्षमा अपराध तू
होने वाले अपराधों का करती क्यूँ न प्रतिकार तू ।।
आज भी दुर्योधन-दुशासन जैसे लोगों की कमी नहीं
कर्ण सरीखे रणकुवरे की विषैली वाणी थमी नहीं
देख रहे हैं ऐसे कितने, जैसे हम इन्सान हैं ही नहीं
पशु भी शरमा जाये, घिनौनी हरकतें थमी नहीं
बाहर कदम पङे कैसे, सराफत नहीं बची हो जैसे
इन सरफिरो से डरो नहीं, दुर्गा-चण्डी की अवतार तू
होने वाले अपराधों का करती क्यूँ नहीं प्रतिकार तू ।।
कर प्रतिकार तू
Comments
10 responses to “कर प्रतिकार तू”
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अपराधों का करती क्यूँ न प्रतिकार तू , आनुप्रासिक छठा से सुसज्जित और यथार्थ पर आधरित प्रेरक पंक्तियाँ
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सादर आभार
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“दुर्योधन , दुहशासन जैसे लोगों की कमी नहीं है आज भी”
ऐसे लोगों का प्रतिकार करना ही चाहिए ऐसे लोग समाज पर एक बदनुमा दाग हैं। कविता में कवयित्री ने दुर्गा चंडी का अवतार लेने की बात भी कही है, जी कि ऐसी विकट परिस्थिति में अति आवश्यक है।
… बहुत ही सटीक प्रस्तुति ।-

सादर आभार
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उम्दा कविता
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Nice
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सादर आभार
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वाह बहुत ही प्रशंसनीय
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सादर आभार
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