कविता- गरीबी

एक दिन गया बाजार मैं
जेब में रूपये दस !
जी चाहे खाऊँ समोसे
कुरकुर और भसभस !!
पूछन लगा दूकान में
देगा क्या सरबस !
बोला पेटले सेठ ने
एक का रूपये दस !!
गरीबी अभिशाप है
वही लगाया दंस !
हुआ मुझे एहसास तब
हो गया यह बरबस !!
लेनी थी सब्जी मुझे
मन को डांटा बस !
आँखो को समझा लिया
खुद पे दिया मैं हंस !!

उपाध्याय (मतिहीन)
१८-६-२०१६


 

Comments

One response to “कविता- गरीबी”

  1. Chandra Prakash Avatar
    Chandra Prakash

    true lines

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