कविता- कसम
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सौ बार कसम मैने खाई ,
फिर खुद ही उसको तोड़ा था,
जब जब होती नादानी मुझसे,
रब के आगे रोया था,
दिल खोल के कहता-
हर एक बातें,
प्रभु गलती मेरी माफ करो,
नादानी और जवानी मे,
अज्ञानी और सयानी मे,
भुल गया था सपत मै अपना,
भुल किया खुद हाथो से|
ना चोरी किया ना हत्या किया,
ना जग मे कोई कुकर्म किया,
मात पिता औरों के संग,
खुद कि बहना या गैरो के संग,
अपनों जस सम्मान दिया|
एक गलती मै नीत करता था,
सोच के फ्यूचर रोता था,
कल सुधरे जीवन खुशी रहे,
इसलिए कसम मै खाता था|
“ऋषि” मुरख कि बात सुनो,
माना तुम बड़ ज्ञानी विज्ञानी हो,
जिनके मन मे दृढ़ संकल्प नही,
जिनका मन खुद वश मे नही,
मंदिर मस्जिद चर्च मे जा के रोवे,
उनके संग कभी भगवान नही|
जिनके जीवन मे सपना ना,
उनका जीवन खुद अपना ना,
माना गलती कर बैठे हो,
अब गलती दुहराना ना|
ज्ञान कर्म इन्द्रिय को वश मे करना सिखो,
बनकर लवकुश घोड़े को पकड़ना सिखो,
जो अम्बर भू चारो दिशाओ को वस्त्र बनाया,
कामुकता पे विजय प्राप्त कर-
उसके जस अब मन मे संकल्प उठाना सिखो|
राम वचन है या वचन राम है,
राम को जीवन मे पढ़ना सिखो,
खुद के शत्रु को ईशा से माफ़ी देना सीखो,
बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग पर चलना सीखो,
दुख के बादल हट जाएंगे,
खुद की नजरों में ना गिर पाएंगे,
अब हर मंजिल तेरी चौखट चुम के जाए,
खुद पर विजयी होने के लिए,
फिर से संकल्प उठाया है|
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****ऋषि कुमार “प्रभाकर”——
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