काटी है रात तुमने भी ले-ले के करवटें
देखो बता रही हैं, चादर की सलवटें।
उधड़ेगी किसी रोज सिलाई ये देखना
यूं इस तरहं जो लेकर अंगडाईयां उट्ठे।
पहले ही हो रही है, बड़ी जोर की बारिश
अब आप लगे भीगी जुल्फों को झटकनें।
तस्वीर मेरी सीने पे रखकर न सोइये
हर सांस मेरी नींद भी लगती है उचटने।
एकटक न देख लेना कहीं डूबता सूरज
मुमकिन है रात भर फिर वो शाम न ढले।
……….सतीश कसेरा
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