कुछ इंतजाम मेरे लिए भी हो

तर्क हैं वितर्क हैं
पक्ष के भी विपक्ष के भी
देख रहा हूँ
टकटकी लगाये,
कुछ फायदे की बात
मेरे लिए भी हो।
अब पाला पड़ने लगा है
छतरहित घर में मेरे
तीन शेड का इंतज़ाम
मेरे लिए भी हो।
तर्क-वितर्क जो भी हों,
लेकिन
बच्चों को अच्छे स्कूल में
पढ़ाने का इंतजाम
मेरे लिए भी हो।
खाने-पहनने का
इंतज़ाम मेरे लिए भी हो।
कोई बैठे कुर्सी में
लेकिन
जीने का इंतजाम
मेरे लिए भी हो।

Comments

6 responses to “कुछ इंतजाम मेरे लिए भी हो”

  1. Geeta kumari

    गरीब व्यक्ति को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सत्ता में कौन है
    कौन नहीं ,वो बेचारा तो अपने व अपने परिवार की सुरक्षा के साधन मुहैया करने की बाट जोहता है, यही सोच दर्शाती हुई कवि सतीश जी की बेहद संजीदा रचना
    ” भूखे भजन ना होई गोपाला,
    यह ले अपनी कंठी माला ” ये कहावत को चरितार्थ करती हुई बहुत सुंदर कविता

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. बहुत ही लाजबाब कविता लिखी है सर।

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत आभार

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

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