कुछ न कुछ दिल में चलता रहता है।

कुछ न कुछ दिल में चलता रहता है।
इक ख़्वाब अनदेखा पलता रहता है।।
,
क़िस्मत कहें की मुक़द्दर कहें उसको।
जो नाम सुबह शाम खलता रहता है।।
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वक़्त गुजरा है कुछ इस तरह से जैसे।
मोम सी जिंदगी से मोम गलता रहता है।।
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अब धुंआ धुंआ ही बचा हूँ आकर देखों।
वैसे मिटटी में राख़ कहाँ जलता रहता है।।
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हमने जो कह दिया उस पर ही कायम है।
हम मौसम नहीं की जो बदलता रहता है।।
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अपनों अश्क़ो पर गुमान करते हो ठीक है।
पर दरिया ए अश्क़ यहाँ भी निकलता रहता है।
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उसके यहाँ न शाम हुई न वो मिलने आया।
यहाँ रोज सूरज निकलके ढ़लता रहता है।।
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साहिल जिसकी जुस्तजू में जिंदगी गुजार दी।
वो बस हमको छोड़के सबसे मिलता रहता है।।
@@@@RK@@@@

Comments

8 responses to “कुछ न कुछ दिल में चलता रहता है।”

  1. Kumar Bunty Avatar
    Kumar Bunty

    UMDA

    1. Ramesh Singh Avatar
      Ramesh Singh

      Thanks

    1. Ramesh Singh Avatar
      Ramesh Singh

      Thanks

  2. राम नरेशपुरवाला

    Wah

  3. राम नरेशपुरवाला

    Good

  4. Abhishek kumar

    सुन्दर रचना

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