कोपल दया की अब तो,
उग जा,
नमी नमी है,
बरसात का यौवन,
किस बात की कमी है।
अब तो हवा भी सूखी-सूखी
नहीं है बिल्कुल।
आकाश भी है गीला
गीली हुई जमीं है।
अब भी तुझे प्रतीक्षा
किसकी है तू बता दे,
ममता दया के अंकुर
कह दे कहाँ कमी है।
कोपल दया की अब तो
Comments
2 responses to “कोपल दया की अब तो”
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बहुत सुन्दर पंक्तियाँ, लाजवाब अभिव्यक्ति भाव और शिल्प का सुन्दर समन्वय
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सुंदर रचना
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