राहों में आपके
कोमल सी दूब हो,
पाने का हो जुनून मन में
उमंग खूब हो।
आ जायें जब कभी
मायूसियों के दिन
कुहरे के बीच भी
थोड़ी सी धूप हो।
मन साफ हो दिखे वो
सच में हो सच की छाया
भीतर वही भरा हो
बाहर जो रूप हो।
हर ओर हो उमंगें
उल्लास का सफर हो
मन सब तरफ रमा हो
बिल्कुल न ऊब हो।
कोमल सी दूब हो
Comments
9 responses to “कोमल सी दूब हो”
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अति सुन्दर कविता
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बहुत बहुत धन्यवाद
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उत्तम लेखन
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बहुत धन्यवाद
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बहुत ख़ूब, सुंदर शिल्प एवम् सुन्दर भाव लिए हुए अति सुन्दर कविता, अति उत्तम प्रस्तुति
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत खूब
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सादर धन्यवाद
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बहुत सुंदर
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