कोमल सी दूब हो

राहों में आपके
कोमल सी दूब हो,
पाने का हो जुनून मन में
उमंग खूब हो।
आ जायें जब कभी
मायूसियों के दिन
कुहरे के बीच भी
थोड़ी सी धूप हो।
मन साफ हो दिखे वो
सच में हो सच की छाया
भीतर वही भरा हो
बाहर जो रूप हो।
हर ओर हो उमंगें
उल्लास का सफर हो
मन सब तरफ रमा हो
बिल्कुल न ऊब हो।

Comments

9 responses to “कोमल सी दूब हो”

  1. अति सुन्दर कविता

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. उत्तम लेखन

    1. Satish Pandey

      बहुत धन्यवाद

  3. Geeta kumari

    बहुत ख़ूब, सुंदर शिल्प एवम् सुन्दर भाव लिए हुए अति सुन्दर कविता, अति उत्तम प्रस्तुति

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  4. Seema Chaudhary

    बहुत सुंदर

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