वन-वन भटका खोज में, गूलर के फूल के।
आखिर खोज न पाया मैं सिवा एक उसूल के।।
फूल नहीं होता इसमें होते केवल फल अगणित।
बिन फूलों के फल कहाँ से बोलो आए अगणित।।
जैसे पानी बर्फ के रुप वैसे गूलर के फूल अनूप।
“विनयचंद “न जान सके मायापति के खेल अनूप।।
खोज गूलर के फूल के
Comments
9 responses to “खोज गूलर के फूल के”
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Good
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Thanksgiving you
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वेलकम
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Very nice
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Nyc
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Nice good
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Nice
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वाह बहुत सुंदर रचना
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Nice
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