घर में डाॅन

मीच के आँखें रोते -रोते
खोज रहा हूँ होकर मौन।
मुझको रुलानेवाला जग में
छुपकर बैठा आखिर कौन?
नजर भला वो आए कैसे
घर में बैठा बनकर डाॅन ।।

Comments

9 responses to “घर में डाॅन”

  1. जीवन के कठोर अनुभव और सच्चाई से लबरेज है यह कविता, बार बार पढ़ने और सोचने पर मजबूर कर रही है, आपकी लेखनी विलक्षण है, जन-भाषा का सुंदर प्रयोग है, बहुत सुंदर कविता।

    1. बहुत बहुत आभार सहित धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    बहुत सुंदर कविता है भाई जी। हृदय स्पर्शी रचना।

    1. शुक्रिया बहिन

  3. बहुत ही भावपूर्ण, सुन्दर अभिव्यक्ति

  4. Antariksha Saha Avatar
    Antariksha Saha

    Bahut khoob

  5. मोहन सिंह मानुष Avatar

    बहुत सुंदर प्रस्तुति

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