समेटता हूँ बिखरते ख्वाब को सजाता हूँ
रोज तकदीर को लिखता हूँ और मिटाता हूँ |
जो मद में चूर हो भूले है अपने ओहदे को
आईना देकर उन्हे उनकी जगह दिखाता हूँ ||
हवा हूँ मैं खुला ये आसमा वतन है मेरा
घरौदें फिर भी रोज रेत का बनाता हूँ |
मै आसमां का एक टूटा हुआ सितारा हूँ
वजूद कुछ भी नही है फिर भी जगमगाता हूँ ||
उपाध्याय…
चंद शेर और मतले

Comments
3 responses to “चंद शेर और मतले”
-
बहुत खूब जी ।
-

वाह बहुत सुंदर
-

Good
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.